नहीं रहीं लोक कला की ‘महाभारत’: दुनिया जीतने वाली तीजन बाई का बचपन के संघर्ष से पद्म विभूषण तक का सफर

Teejan Bai Biography. छत्तीसगढ़ की माटी की महक को सात समंदर पार पहुंचाने वाली और महाभारत के पात्रों को अपने तंबूरे व बुलंद आवाज से जीवंत करने वाली महान पंडवानी गायिका पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई अब हमारे बीच नहीं रहीं। 5 जुलाई 2026 की तड़के 3:15 बजे रायपुर के एम्स (AIIMS) अस्पताल में 70 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से बीमार चल रही थीं। उनके निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय सहित देश-विदेश के कला प्रेमियों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। उनके गृह ग्राम गनियारी (दुर्ग) में राजकीय सम्मान के साथ उनका अंतिम संस्कार किया गया।

आइए जानते हैं बचपन के कड़े संघर्षों से लेकर दुनिया के सबसे बड़े मंचों तक पहुंचने वाली तीजन बाई की पूरी जीवन यात्रा:

बधाइयों के बजाय मिली प्रताड़ना: ऐसा था तीजन का बचपन

तीजन बाई का जन्म 8 अगस्त 1956 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के गनियारी गांव में एक बेहद गरीब पारधी आदिवासी परिवार में हुआ था। पिता चुनुक लाल पारधी और मां सुखवती के घर जन्मी तीजन को बचपन से ही संगीत और कहानियों का शौक था।

उस दौर में उनके नाना बृजलाल पारधी महाभारत की कहानियां गाया करते थे। तीजन छिप-छिपकर उन्हें सुनतीं और झोपड़ी के पीछे जाकर तंबूरे की जगह झाड़ू या लाठी पकड़कर हूबहू नकल करती थीं। जब समाज और परिवार को पता चला कि एक लड़की होकर वह ‘पंडवानी’ गा रही है, तो उनका कड़ा विरोध हुआ। पारधी समाज में महिलाओं का मंच पर गाना पाप माना जाता था। विरोध इतना बढ़ा कि उन्हें समाज और परिवार से बहिष्कृत कर दिया गया, लेकिन तीजन ने हार नहीं मानी और एक छोटी सी झोपड़ी बनाकर अपनी कला को मांजती रहीं।

रूढ़ियों को तोड़ रचा इतिहास: कापालिक शैली की पहली महिला

पंडवानी मुख्य रूप से दो शैलियों में गाई जाती है—वेदमती (बैठकर गाना) और कापालिक (खड़े होकर, अभिनय और नृत्य के साथ हाथ में तंबूरा लेकर गाना)। उस दौर में कापालिक शैली पर सिर्फ पुरुषों का एकाधिकार था।

तीजन बाई ने मात्र 13 वर्ष की उम्र में पहली बार मंच पर कदम रखा। उन्होंने न सिर्फ समाज की बंदिशों को तोड़ा, बल्कि पुरुषों के वर्चस्व वाली ‘कापालिक शैली’ को अपनाया। जब वे हाथ में तंबूरा लेकर, लाल साड़ी पहने, बुलंद आवाज में दुशासन वध या द्रौपदी चीरहरण का प्रसंग गाती थीं, तो दर्शक दांतों तले उंगलियां दबा लेते थे। तंबूरा कभी उनके हाथ में अर्जुन का गांडीव धनुष बन जाता, तो कभी भीम की गदा।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पटल पर चमक

तीजन बाई की प्रतिभा को पहचान तब मिली जब मध्य प्रदेश के रंगकर्मी हबीब तनवीर ने उन्हें सुना। इसके बाद तीजन का सफर थमा नहीं। उन्होंने मशहूर निर्देशक श्याम बेनेगल के दूरदर्शन धारावाहिक ‘भारत एक खोज’ में महाभारत के प्रसंगों की अद्भुत प्रस्तुति दी। इसके बाद वे भारत महोत्सवों के जरिए इंग्लैंड, फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, तुर्की, ट्यूनिशिया और साइप्रस जैसे कई देशों में छत्तीसगढ़ी लोक कला का परचम लहराने लगीं।

पुरस्कारों की झड़ी: देश के तीनों सर्वोच्च पद्म सम्मानों से नवाजी गईं

कला जगत में तीजन बाई के अद्वितीय योगदान के लिए भारत सरकार और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने उन्हें पलकों पर बिठाया। उन्हें मिले प्रमुख पुरस्कार निम्नलिखित हैं:

वर्ष पुरस्कार/सम्मान
1988 पद्म श्री (भारत सरकार)
1995 संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
2003 पद्म भूषण (भारत सरकार)
2003 बिलासपुर यूनिवर्सिटी द्वारा मानद डी.लिट (D.Litt.) की उपाधि
2016 एम. एस. सुब्बालक्ष्मी शताब्दी पुरस्कार
2018 फुकुओका पुरस्कार (जापान का प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय सम्मान)
2019 पद्म विभूषण (देश का दूसरा सबसे बड़ा नागरिक सम्मान)

इसके अलावा उन्हें नृत्य शिरोमणि और कला शिरोमणि जैसी दर्जनों उपाधियों से सम्मानित किया गया था।

क्या खास रहा तीजन बाई के जीवन में?

  • अंगूठाछाप लेकिन डॉ. तीजन बाई: तीजन बाई कभी स्कूल नहीं गईं, वे निरक्षर थीं। लेकिन लोक कला को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए उन्हें विश्वविद्यालयों ने ‘डॉक्टरेट’ की मानद उपाधि से नवाजा।
  • तंबूरा ही था उनका संसार: वे अपने तंबूरे को केवल एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि अपना बच्चा मानती थीं। वे मंच पर बिना किसी तामझाम के सिर्फ एक तंबूरे और अपनी कड़कड़ाती आवाज से हजारों की भीड़ को घंटों बांधे रखती थीं।
  • आने वाली पीढ़ी के लिए प्रेरणा: उन्होंने जीवन के आखिरी पड़ाव तक नई पीढ़ी के कलाकारों को पंडवानी की शिक्षा दी और इस प्राचीन विधा को मरने नहीं दिया।

अंतिम सफर

पिछले कुछ हफ्तों से तीजन बाई की तबीयत काफी नाजुक थी। उन्हें सांस लेने में तकलीफ और उम्र संबंधी कई गंभीर बीमारियों के कारण 27 मई 2026 को रायपुर एम्स में भर्ती कराया गया था। डॉक्टरों के अथक प्रयासों के बावजूद 5 जुलाई की सुबह वे हमेशा के लिए खामोश हो गईं।

भले ही आज तीजन बाई का भौतिक शरीर शांत हो गया है, लेकिन जब-जब महाभारत के वीर रस की बात होगी, छत्तीसगढ़ की माटी से गूंजती उनकी बुलंद आवाज हमेशा अमर रहेगी। कला जगत के एक स्वर्णिम अध्याय का आज अंत हो गया।

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