रथ खींचने वाली रस्सियों के भी हैं विशेष नाम! जगन्नाथ रथयात्रा से जुड़ी 10 ऐसी बातें, जो शायद ही आपको पता हों

 

Unheard Secrets of Jagannath Rath Yatra. हर साल ओडिशा के पुरी में निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस महाआयोजन में लाखों की संख्या में श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के रथों को खींचने आते हैं। हम सब रथयात्रा का भव्य नजारा तो देखते हैं, लेकिन इस परंपरा से जुड़ी कई ऐसी गहरी और रोचक बातें हैं, जिनसे आम लोग आज भी अनजान हैं।

क्या आप जानते हैं कि जिन रस्सियों से ये विशाल रथ खींचे जाते हैं, उनका भी एक नाम और महत्व है? आइए जानते हैं जगन्नाथ रथयात्रा से जुड़ी 10 ऐसी ही दिलचस्प और अनसुनी बातें:

1. रथ खींचने वाली रस्सियों के रहस्यमयी नाम

आम लोगों को लगता है कि रथ को खींचने के लिए आम रस्सियों का इस्तेमाल होता है, लेकिन ऐसा नहीं है। इन रस्सियों को पवित्र नागों का प्रतीक माना जाता है।

  • भगवान जगन्नाथ के रथ (नंदीघोष) की रस्सी को ‘शंखचूड़’ कहा जाता है।
  • भगवान बलभद्र के रथ (तालध्वज) की रस्सी को ‘वासुकी’ कहते हैं।
  • देवी सुभद्रा के रथ (दर्पदलन) की रस्सी का नाम ‘स्वर्णचूड़’ है।

2. रथों में नहीं लगती एक भी लोहे की कील

आपको जानकर हैरानी होगी कि हर साल बनाए जाने वाले इन तीन विशाल और ऊंचे रथों के निर्माण में लोहे की एक भी कील या नट-बोल्ट का इस्तेमाल नहीं होता। लकड़ियों को खास तरीके से काटकर एक-दूसरे में फंसाकर (जॉइंट्स बनाकर) पूरा रथ तैयार किया जाता है।

3. इंची टेप का नहीं, हाथों का होता है इस्तेमाल

आज के दौर में जहां हर चीज मशीन और इंची टेप से नापी जाती है, वहीं इन रथों को बनाने वाले कारीगर (महाराणा) आज भी मापन के लिए किसी आधुनिक टेप का इस्तेमाल नहीं करते। रथों का माप सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार कारीगरों के हाथों (हाथ की लंबाई) और उंगलियों के हिसाब से लिया जाता है।

4. सोने की झाड़ू से होती है रथों की सफाई

रथयात्रा शुरू होने से पहले पुरी के गजपति (राजा) खुद आकर एक विशेष अनुष्ठान करते हैं जिसे ‘छेरा पहंरा’ कहा जाता है। इसमें राजा एक सोने की मूठ वाली झाड़ू से तीनों रथों के मंडप को बुहारते हैं (सफाई करते हैं)। यह संदेश देता है कि भगवान के सामने राजा और रंक सब बराबर हैं।

5. रथों के पहियों और रंगों का विशेष विधान

तीनों रथ एक जैसे नहीं होते, बल्कि उनमें बड़ा अंतर होता है:

  • भगवान जगन्नाथ के रथ (नंदीघोष) में 16 पहिए होते हैं और इसका रंग लाल और पीला होता है।
  • बलभद्र जी के रथ (तालध्वज) में 14 पहिए होते हैं और इसका रंग लाल और हरा होता है।
  • सुभद्रा जी के रथ (दर्पदलन) में 12 पहिए होते हैं और इसका रंग लाल और काला होता है।

6. मौसी के घर ‘पोड़ा पीठा’ का भोग

जब रथयात्रा गुंडिचा मंदिर (भगवान की मौसी का घर) की ओर बढ़ती है, तो बीच में ‘मौसी मां’ का मंदिर पड़ता है। यहां रथ रुकते हैं और तीनों भाई-बहनों को उनका सबसे पसंदीदा भोग ‘पोड़ा पीठा’ (एक खास तरह का मीठा व्यंजन) खिलाया जाता है।

7. रुष्ट होकर माता लक्ष्मी तोड़ती हैं रथ का हिस्सा

रथयात्रा के पांचवें दिन एक बेहद रोचक रस्म ‘हेरा पंचमी’ निभाई जाती है। मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ माता लक्ष्मी को बिना बताए भाई-बहन के साथ निकल जाते हैं। इससे नाराज होकर माता लक्ष्मी गुंडिचा मंदिर पहुंचती हैं और गुस्से में भगवान जगन्नाथ के रथ का एक छोटा सा हिस्सा तोड़ देती हैं।

8. हर साल वसंत पंचमी से शुरू होती है लकड़ियों की खोज

रथों का निर्माण अचानक नहीं होता। इसके लिए लकड़ियों का चुनाव वसंत पंचमी के दिन से ही शुरू हो जाता है और अक्षय तृतीया के दिन से रथों का निर्माण कार्य विधिवत रूप से शुरू किया जाता है। इसके लिए खास नीम और धौरा के पेड़ों की लकड़ियां चुनी जाती हैं।

9. हवा के विपरीत लहराती है रथ की ध्वजा

भगवान जगन्नाथ के रथ के सबसे ऊपर लगे तिकोने झंडे (ध्वजा) को ‘त्रैलोक्यमोहिनी’ कहा जाता है। पुरी के मुख्य मंदिर की तरह ही रथ के ऊपर लगा यह झंडा भी हमेशा हवा की दिशा के विपरीत लहराता है, जो आज भी विज्ञान के लिए एक रहस्य है।

10. रथ यात्रा के बाद क्या होता है इन रथों का?

यात्रा पूरी होने और भगवान के वापस अपने मुख्य मंदिर में लौट आने के बाद इन रथों को विघटित (खोल) कर दिया जाता है। बाद में इन पवित्र लकड़ियों का उपयोग जगन्नाथ मंदिर की दुनिया की सबसे बड़ी रसोई में भगवान का महाप्रसाद पकाने के लिए ईंधन के रूप में किया जाता है। इस तरह रथ का हर एक कण भगवान की सेवा में लग जाता है।

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