धागों में बंधा रक्षा का वचन: कब और कैसे शुरू हुआ रक्षाबंधन? द्वापर युग से लेकर मध्यकालीन इतिहास की कहानियां

Raksha Bandhan History. सावन मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन केवल रेशमी धागों का त्योहार नहीं, बल्कि परस्पर विश्वास, स्नेह और सुरक्षा के संकल्प का महापर्व है। वैदिक काल से लेकर मध्यकालीन इतिहास तक रक्षा के इस पावन सूत्र ने कई रूपों में समाज को जोड़ा है। भाई-बहन के इस रिश्ते की शुरुआत कैसे और कब हुई, इसको लेकर कई पौराणिक, वैदिक और ऐतिहासिक प्रसंग मिलते हैं।

पौराणिक व वैदिक मान्यताएं: कहां से बंधी पहली रक्षा?

  • श्रीकृष्ण और द्रौपदी की कथा: महाभारत काल में जब भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल का वध करने के लिए सुदर्शन चक्र चलाया, तो उनकी उंगली कट गई। द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का आंचल फाड़कर उनकी उंगली पर बांध दिया। श्रीकृष्ण ने इसे रक्षा सूत्र मानकर द्रौपदी को हर संकट में रक्षा का वचन दिया और चीरहरण के समय उसी साड़ी को अनंत बढ़ाकर अपनी बहन का मान रखा।

  • राजा बलि और मां लक्ष्मी: जब भगवान विष्णु वामन अवतार लेकर पाताल लोक में राजा बलि के द्वारपाल बन गए, तब देवी लक्ष्मी ने एक साधारण स्त्री के वेश में बलि को रक्षा सूत्र बांधा और उन्हें अपना भाई बनाया। उपहार के रूप में उन्होंने भगवान विष्णु को वापस वैकुंठ ले जाने का वर मांगा। उस दिन भी श्रावण पूर्णिमा थी।

  • देवराज इंद्र और इंद्राणी की वैदिक कथा: भविष्य पुराण के अनुसार, देवासुर संग्राम के समय जब देवता असुरों से पराजित हो रहे थे, तब देवगुरु बृहस्पति के परामर्श पर इंद्राणी (शची) ने मंत्रोच्चार के साथ एक रक्षा सूत्र तैयार किया और इंद्र की कलाई पर बांधा। इस सूत्र की शक्ति से देवताओं को विजय मिली। प्राचीन काल में यह सूत्र किसी भी युद्ध या संकट के समय सुरक्षा के लिए बांधा जाता था।

ऐतिहासिक संदर्भ: जब धागों ने तय की सियासत और रिश्ते

  • रानी कर्णावती और हुमायूं: चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह के आक्रमण से मेवाड़ की रक्षा के लिए मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजी थी। हुमायूं ने इस रक्षा सूत्र का मान रखा और मेवाड़ की रक्षा के लिए अपनी सेना लेकर रवाना हुआ था।

  • सिकंदर और पोरस की पत्नी: एक अन्य ऐतिहासिक वृत्तांत के अनुसार, राजा पोरस के विरुद्ध युद्ध के समय सिकंदर की पत्नी रोक्साना ने पोरस को राखी भेजकर अपने पति के जीवन की रक्षा का वचन मांगा था। युद्ध भूमि में अवसर मिलने के बावजूद पोरस ने सिकंदर पर वार नहीं किया।

  • रवींद्रनाथ टैगोर का एकता संदेश (1905): बंगाल विभाजन के विरोध में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने रक्षाबंधन को सामाजिक सद्भाव और हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में मनाया था, जहां लोगों ने एक-दूसरे को राखी बांधकर एकता का संकल्प लिया था।

समय के साथ परंपरा का विस्तार वैदिक काल में ब्राह्मण और पुरोहित यजमानों को ‘येन बद्धो बली राजा…’ मंत्र के साथ रक्षा सूत्र बांधते थे, जो कालान्तर में बहनों द्वारा भाइयों को और अंततः मानवीय सुरक्षा व सामाजिक समरसता के विस्तृत पर्व के रूप में विकसित हो गया। आज यह पर्व सिर्फ पारिवारिक सीमाओं तक सीमित न रहकर सीमाओं पर तैनात सैनिकों और पर्यावरण संरक्षण के लिए पेड़ों को राखी बांधने जैसे जन-आंदोलनों का भी प्रतीक बन चुका है।

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भगवान विष्णु के राजा बलि का द्वारपाल बनने की कहानी

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, भगवान विष्णु अपने परम भक्त राजा बलि की दानवीरता, निष्ठा और वचनबद्धता से प्रसन्न होकर पाताल लोक (सुतल लोक) में उनके द्वारपाल बने थे। यह पूरी कथा इस प्रकार घटित हुई:

पृष्ठभूमि: वामन अवतार और तीन पग भूमि

  • स्वर्ग पर बलि का अधिकार: असुरराज राजा बलि ने 100 अश्वमेध यज्ञ पूर्ण कर तीनों लोकों और देवराज इंद्र के स्वर्ग पर अधिकार कर लिया था। देवताओं की प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने महर्षि कश्यप और माता अदिति के पुत्र के रूप में ‘वामन अवतार’ लिया।

  • तीन पग भूमि का दान: वामन रूप में भगवान बलि के अंतिम यज्ञ में पहुंचे और भिक्षा में केवल तीन पग भूमि मांगी। बलि के गुरु शुक्राचार्य ने उन्हें चेतावनी भी दी, लेकिन वचन के पक्के बलि ने दान का संकल्प ले लिया।

  • विराट त्रिविक्रम रूप: भगवान ने अपने विराट रूप में पहले पग में पूरी पृथ्वी और दूसरे पग में समस्त आकाश व स्वर्ग को नाप लिया। जब तीसरा पग रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तो बलि ने बिना संकोच अपना सिर आगे कर दिया।

वरदान और द्वारपाल बनने का कारण

  • सुतल लोक का राज्य: बलि के इस अद्वितीय समर्पण और दान से प्रसन्न होकर भगवान ने उनके सिर पर पैर रखकर उन्हें पाताल के सबसे सुंदर लोक ‘सुतल’ का राजा बना दिया और अगले मन्वंतर में इंद्र बनने का आशीर्वाद दिया।

  • बलि का वरदान: भगवान ने बलि से वरदान मांगने को कहा। बलि ने विनम्रतापूर्वक कहा— “हे प्रभु! जब भी मैं अपनी आंखें खोलूं, मुझे केवल आपके दर्शन हों। आप सदैव मेरे महल में मेरे सामने उपस्थित रहें।”

  • द्वारपाल के रूप में नियुक्ति: भक्त के इस प्रेम और संकल्प से बंधकर भगवान विष्णु ने बलि के महल का द्वारपाल (रक्षक) बनना स्वीकार कर लिया और दिन-रात उनके द्वार पर गदा धारण कर पहरा देने लगे।

मुक्ति और रक्षाबंधन का संबंध

भगवान जब काफी समय तक वैकुंठ नहीं लौटे, तो माता लक्ष्मी चिंतित होकर एक साधारण स्त्री के रूप में राजा बलि के पास पहुंचीं। उन्होंने बलि को रक्षा सूत्र (राखी) बांधकर भाई बनाया। जब बलि ने बहन से उपहार मांगने को कहा, तो माता लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को द्वारपाल के बंधन से मुक्त कर वैकुंठ लौटाने का वचन मांग लिया। बलि ने अपनी बहन की बात का मान रखते हुए भगवान को विदा किया, जिसके बाद भगवान ने बलि को वचन दिया कि वे हर वर्ष चार महीने (चातुर्मास) उनके पास पाताल में ही निवास करेंगे।

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