भाग्य बड़ा या पुरुषार्थ, जानें क्या कहते हैं सनातन के ग्रंथ और शास्त्र, अंत में दिए उदाहरण से हो जाएगी पूरी तस्वीर साफ
Karma vs Destiny. हिंदू दर्शन में कर्म और भाग्य (प्रारब्ध) को लेकर गहरी व्याख्या मिलती है। अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या केवल भाग्य के भरोसे बैठकर सब कुछ हासिल किया जा सकता है? वेद, उपनिषद, श्रीमद्भगवद्गीता और रामायण जैसे प्रमुख धर्मग्रंथ इस बात को पूरी स्पष्टता से खारिज करते हैं कि बिना कर्म के केवल भाग्य से कुछ भी प्राप्त हो सकता है। सनातन परंपरा के अनुसार भाग्य कोई स्वतंत्र शक्ति नहीं, बल्कि मनुष्य के पूर्व में किए गए कर्मों का ही संचित परिणाम है।
भाग्य क्या है?
धर्मग्रंथों में कर्म को तीन श्रेणियों में बांटा गया है:
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संचित कर्म: पूर्व जन्मों और पिछले समय के सभी कर्मों का कुल संग्रह।
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प्रारब्ध कर्म: संचित कर्मों का वह हिस्सा जो वर्तमान जीवन में फल देने के लिए परिपक्व हुआ है (जिसे सामान्य भाषा में भाग्य कहा जाता है)।
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क्रियमाण कर्म: वे कर्म जो मनुष्य वर्तमान क्षण में अपनी इच्छाशक्ति से कर रहा है।
धर्मग्रंथों के अनुसार कर्म की प्रधानता
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श्रीमद्भगवद्गीता का संदेश:
भगवान श्रीकृष्ण ने गीता (अध्याय 2, श्लोक 47) में स्पष्ट कहा है:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
अर्थात मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं। यदि बिना कर्म किए सब कुछ भाग्य से मिल जाता, तो भगवान अर्जुन को कर्मक्षेत्र में उतरने का उपदेश न देते।
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श्रीरामचरितमानस की दृष्टि:
गोस्वामी तुलसीदास जी ने लिखा है:
कर्म प्रधान विस्व करि राखा। जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥
संसार कर्म प्रधान है; यहाँ जो जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल मिलता है।
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चाणक्य नीति और हितोपदेश का प्रमाण:
नीति शास्त्रों में कहा गया है:
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः। न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः॥
अर्थात कार्य केवल परिश्रम (कर्म) से सिद्ध होते हैं, केवल सोचने या भाग्य पर बैठने से नहीं। सोए हुए सिंह के मुख में हिरण खुद प्रवेश नहीं करता; उसे भी शिकार के लिए कर्म करना पड़ता है।
कर्म और भाग्य का परस्पर संबंध
भाग्य को उस बीज की तरह माना गया है जिसे भूमि (वर्तमान कर्म) और जल-खाद (प्रयास) के बिना अंकुरित नहीं किया जा सकता। यदि किसी के भाग्य में धन या सफलता लिखी भी हो, तो भी उसे पाने के लिए क्रिया (कर्म) का माध्यम अनिवार्य है। वर्तमान का कर्म ही भविष्य के भाग्य का निर्माण करता है; इसलिए कर्म के बिना भाग्य निष्क्रिय रहता है।

