राजनीति के बाहुबलि निकले नरोत्तम : संगठन से लेकर जनप्रतिनिधियों के इस्तीफों की बाढ़, सारे बूथ अध्यक्ष भी शामिल
Narottan Mishra Case Study. मध्य प्रदेश की सियासत में ‘संकटमोचक’ कहे जाने वाले भाजपा के कद्दावर नेता और पूर्व गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट क्या कटा, दतिया में मानो राजनीतिक सुनामी आ गई। आलाकमान के इस फैसले से नाराज नरोत्तम मिश्रा (जिन्हें समर्थक प्यार से ‘दादा’ कहते हैं) के समर्थकों ने न सिर्फ बगावत का बिगुल फूंक दिया, बल्कि सामूहिक इस्तीफों की झड़ी लगा दी। हालात इतने बेकाबू हो गए कि दतिया-झांसी राष्ट्रीय राजमार्ग (NH-44) पर लगभग 12 घंटे तक चक्काजाम रहा, जो बाद में पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़प में बदल गया।
कितने जनप्रतिनिधियों और पदाधिकारियों ने दिया इस्तीफा?
पार्टी के इस फैसले के विरोध में नरोत्तम मिश्रा के समर्थन में उतरते हुए भाजपा संगठन के ढांचे को हिलाकर रख दिया गया:
- पूरी जिला कार्यकारिणी का इस्तीफा: दतिया के भाजपा जिला अध्यक्ष रघुवीर कुशवाह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
- 291 बूथों पर ताला! सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि दतिया विधानसभा के सभी 291 बूथों के अध्यक्षों और उनकी पूरी कार्यकारिणी ने सामूहिक रूप से अपने दायित्वों से इस्तीफा दे दिया।
- जनप्रतिनिधियों की बगावत: दतिया के कई भाजपा पार्षदों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी अपने पदों से त्यागपत्र दे दिया है।
- लगभग 3,000 से अधिक कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने सड़क पर उतरकर साफ कह दिया कि “जब तक दादा नहीं, तब तक भाजपा नहीं।”
क्या है पूरा प्रकरण?
यह पूरी कहानी 2023 के विधानसभा चुनाव से शुरू होती है, जब तत्कालीन गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने एक कड़े मुकाबले में हरा दिया था। हाल ही में एक पुराने धोखाधड़ी के मामले में दिल्ली की अदालत ने राजेंद्र भारती को तीन साल की सजा सुनाई, जिसके चलते उनकी विधायकी रद्द हो गई और दतिया सीट खाली हो गई।
नरोत्तम मिश्रा इस उपचुनाव से अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने के लिए पूरी तरह तैयार थे। उन्होंने बाकायदा नामांकन फॉर्म भी खरीद लिया था और समर्थकों को पूरा भरोसा था कि टिकट ‘दादा’ को ही मिलेगा। लेकिन ऐन वक्त पर भाजपा आलाकमान ने चौंकाने वाला फैसला लेते हुए संघ के करीबी और संगठन के नेता आशुतोष तिवारी को टिकट दे दिया।
पार्टी सूत्रों का गणित: अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, पार्टी नेतृत्व मोहन यादव सरकार में एक नया सत्ता केंद्र बनने से रोकना चाहता था और स्थानीय स्तर पर नरोत्तम मिश्रा के परिवार के खिलाफ उपजी एंटी-इन्कंबेंसी को देखते हुए यह बदलाव किया गया।
हाइवे पर संग्राम और आंसू गैस के गोले: शुक्रवार शाम जैसे ही सूची आई, दतिया में गुस्सा भड़क उठा। लगभग 3,000 समर्थकों ने हाइवे जाम कर दिया, जिससे 15 किलोमीटर लंबा ट्रैफिक जाम लग गया। शनिवार सुबह तक जब बात नहीं बनी, तो प्रदर्शन उग्र हो गया। पथराव में दतिया एसपी मयूर खंडेलवाल सहित 8 पुलिसकर्मी घायल हो गए। पुलिस को भीड़ को तितर-बितर करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े। बवाल बढ़ता देख खुद नरोत्तम मिश्रा को सामने आकर अपील करनी पड़ी, उन्होंने कहा— “यह पार्टी का फैसला है। कार्यकर्ता शांत रहें। सोशल मीडिया पर पेट्रोल-केरोसिन डालने वाले वीडियो न बनाएं।”
क्या पहले कभी किसी नेता के पक्ष में ऐसा विरोध देखने को मिला है?
भारतीय राजनीति और खासकर मध्य प्रदेश में यह कोई पहली घटना नहीं है, लेकिन संगठन के स्तर पर सभी 291 बूथ अध्यक्षों का एक साथ इस्तीफा देना बेहद दुर्लभ और अभूतपूर्व है। इससे पहले भी कुछ बड़े नेताओं के टिकट कटने या उपेक्षा पर ऐसा ही भारी विरोध देखा जा चुका है:
- बाबूलाल गौर (भोपाल, 2018): मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर का जब 2018 में गोविंदपुरा सीट से टिकट कटने की चर्चा थी, तब उनके समर्थकों ने भोपाल में भारी हुंकार भरी थी। खुद गौर ने निर्दलीय या कांग्रेस से लड़ने की धमकी दे दी थी, जिसके बाद पार्टी को झुकना पड़ा और उनकी बहू कृष्णा गौर को टिकट दिया गया।
- सत्यनारायण जटिया (उज्जैन): भाजपा के वरिष्ठ नेता सत्यनारायण जटिया के टिकट कटने पर भी मालवा अंचल में कार्यकर्ताओं ने सामूहिक इस्तीफे और उग्र प्रदर्शन की धमकी दी थी।
- राष्ट्रीय स्तर पर (येदियुरप्पा – कर्नाटक): साल 2011-12 में जब भाजपा आलाकमान ने बीएस येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद से हटाया था, तब उनके समर्थन में दर्जनों विधायकों और मंत्रियों ने इस्तीफे की पेशकश कर दी थी। बाद में येदियुरप्पा ने अपनी अलग पार्टी (KJP) बना ली थी, जिससे भाजपा को भारी नुकसान हुआ था।
अब आगे क्या?
दतिया में नरोत्तम मिश्रा का अपना एक मजबूत व्यक्तिगत वोट बैंक और कैडर है, जो भाजपा से ज्यादा उनके प्रति वफादार है। अब चुनौती भाजपा के नए उम्मीदवार आशुतोष तिवारी के सामने है, क्योंकि रूठे हुए 291 बूथ अध्यक्षों को मनाए बिना दतिया का यह रण जीतना उनके लिए लोहे के चने चबाने जैसा होगा।

