सावधान! आपकी थाली का ‘चावल’ बढ़ा रहा है धरती का संकट, ताजा अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में हुआ बड़ा खुलासा
Drawbacks of rice cultivation. दुनिया की आधी से अधिक आबादी के पेट भरने वाले मुख्य अनाज यानी चावल (Rice) को लेकर एक चौंकाने वाली अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट सामने आई है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि पारंपरिक तरीके से की जा रही चावल की खेती अब पृथ्वी की सहनशक्ति यानी ‘सेफ ऑपरेटिंग स्पेस’ (Safe Operating Space) की सीमाओं को पार कर रही है। इस वजह से हमारी थाली का हर एक निवाला धरती पर जलवायु परिवर्तन, जल संकट और पोषक तत्वों के प्रदूषण (Nutrient Pollution) के बड़े असंतुलन का कारण बन रहा है।
हाल ही में प्रकाशित इस अध्ययन को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित ‘फ्रंटियर्स प्लैनेट प्राइज’ (Frontiers Planet Prize) द्वारा भी विशेष रूप से मान्यता दी गई है।
किसने किया यह अंतरराष्ट्रीय अध्ययन?
यह अभूतपूर्व शोध प्रमुख वैज्ञानिक महमूद एवं उनके साथी शोधकर्ताओं (Mahmood et al.) द्वारा किया गया है, जिसका शीर्षक ‘हार्नेसिंग प्लैनेटरी बाउंड्रीज इन राइस फार्मिंग’ (Harnessing Planetary Boundaries in Rice Farming) है। इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पृथ्वी की वहन क्षमता (Earth’s Carrying Capacity) और पर्यावरण की सीमाओं को ध्यान में रखकर दुनिया भर में होने वाली चावल की खेती के तौर-तरीकों का गहन मूल्यांकन किया है।
अध्ययन के 4 सबसे बड़े और चिंताजनक नतीजे
शोधकर्ताओं ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि चावल की खेती मुख्य रूप से तीन बड़े मोर्चों पर पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह कर रही है:
- ग्लोबल वार्मिंग में बड़ी हिस्सेदारी (Methane Emission): रिपोर्ट के मुताबिक, चावल के खेतों में लगातार पानी भरे रहने (Flooded Paddies) के कारण वहां से भारी मात्रा में मीथेन (Methane) गैस निकलती है। मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कई गुना अधिक हानिकारक और शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैस है। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों के अनुसार, इंसानों द्वारा पैदा होने वाली कुल मीथेन गैस का लगभग 11% हिस्सा अकेले चावल की खेती से आता है।
- भूजल का अत्यधिक दोहन (Water Crisis): चावल दुनिया की सबसे प्यासी फसलों में से एक है। इसकी बड़े पैमाने पर सिंचाई के कारण दुनिया भर में ग्राउंडवाटर (भूजल) का स्तर तेजी से गिर रहा है। इतना ही नहीं, सिंचाई के लिए इस्तेमाल होने वाले डीजल और बिजली पंपों से भी भारी मात्रा में जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन (Fossil Fuel Emissions) होता है।
- नदियों और जलाशयों में प्रदूषण (Freshwater Eutrophication): खेतों में पैदावार बढ़ाने के लिए अंधाधुंध रासायनिक खादों (नाइट्रोजन और फास्फोरस) का इस्तेमाल किया जा रहा है। पानी के साथ बहकर ये तत्व जब स्थानीय नदी-तालाबों में मिलते हैं, तो वहां यूट्रोफिकेशन (पानी में पोषक तत्वों की अधिकता से काई जमना और ऑक्सीजन खत्म होना) की स्थिति पैदा हो जाती है, जिससे जलीय जीवों का दम घुट रहा है।
- जमीन के इस्तेमाल में राहत (Land Use): इस अध्ययन में सिर्फ एक ही राहत की बात सामने आई है कि चावल की खेती भूमि के उपयोग (Land Use) के मामले में अपनी सुरक्षित सीमा के भीतर है। यानी यह अन्य फसलों की तुलना में कम जमीन पर अधिक भोजन प्रदान करने में सक्षम रही है।
वैज्ञानिकों ने क्या बताया समाधान? ‘AWD’ तकनीक देगी राहत
वैज्ञानिकों ने स्पष्ट किया है कि वे चावल खाना बंद करने की सलाह नहीं दे रहे हैं, बल्कि खेती के तरीकों को बदलने की सख्त जरूरत है। शोध में अल्टरनेट वेटिंग एंड ड्राइंग (AWD – Alternate Wetting and Drying) तकनीक को एक क्रांतिकारी उपाय बताया गया है।
- क्या है AWD तकनीक? इस तकनीक के तहत खेतों में लगातार पानी भरकर रखने के बजाय, बीच-बीच में पानी को सुखाया जाता है और फिर सिंचाई की जाती है।
- असरदार नतीजे: एक वैश्विक विश्लेषण के अनुसार AWD तकनीक अपनाने से सिंचाई के लिए पानी की खपत में 34% तक की कमी आती है और मीथेन उत्सर्जन में 47% तक की गिरावट दर्ज की गई है, जबकि धान की पैदावार में केवल 1.5% का मामूली अंतर आता है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर दुनिया को भुखमरी और पर्यावरण संकट दोनों से एक साथ बचाना है, तो पारंपरिक खेती को छोड़कर तुरंत टिकाऊ और डिजिटल मॉनिटरिंग वाली कृषि तकनीकों को अपनाना होगा।

