‘राष्ट्रीय सवर्ण आयोग’ की सुगबुगाहट: BJP सांसदों ने केंद्र के सामने उठाया मुद्दा, संसद में आंकड़ों का नया समीकरण

National Savarna Aayog. देश के राजनीतिक गलियारों और संसद के गलियारों में अब ‘राष्ट्रीय सवर्ण आयोग’ (National Commission for Upper Castes / General Category) के गठन की मांग जोर पकड़ने लगी है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कई सांसदों ने केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों और पार्टी नेतृत्व से मुलाकात कर तर्क दिया है कि जिस प्रकार देश में अनुसूचित जाति (NCSC), अनुसूचित जनजाति (NCST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (NCBC) के अधिकारों और शिकायतों के समाधान के लिए संवैधानिक व वैधानिक आयोग कार्यरत हैं, उसी तरह सामान्य वर्ग यानी सवर्ण समाज के आर्थिक व सामाजिक रूप से कमजोर तबकों के लिए भी एक स्वतंत्र केंद्रीय आयोग का गठन किया जाए।

सवर्ण आयोग को लेकर ताजा सुगबुगाहट क्या है?

  • केंद्रीय मंत्रियों से सांसदों की मुलाकात: उत्तर प्रदेश सहित अन्य राज्यों के आगामी राजनीतिक समीकरणों और यूजीसी गाइडलाइंस व जातिगत गणना की बहसों के बीच सत्तापक्ष के सांसदों ने पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा और अन्य वरिष्ठ कैबिनेट मंत्रियों के समक्ष यह मांग रखी।

  • अखिल भारतीय संगठनों की पहल: इससे पूर्व अखिल भारतीय क्षत्रिय कल्याण परिषद एवं विभिन्न सवर्ण संगठनों ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपकर केंद्रीय स्तर पर आयोग गठित करने का अनुरोध किया था।

  • बिहार मॉडल की मिसाल: सांसदों ने केंद्र के सामने बिहार का उदाहरण रखा है, जहाँ जनवरी 2011 में तत्कालीन नीतीश सरकार ने ‘उच्च जातियों के विकास के लिए राज्य आयोग’ (सवर्ण आयोग) का गठन किया था। बिहार में मई 2025 में इस आयोग का पुनर्गठन कर पूर्व एमएलसी महाचंद्र प्रसाद सिंह को अध्यक्ष और राजीव रंजन प्रसाद को उपाध्यक्ष बनाया गया था। सांसदों का तर्क है कि जब राज्य स्तर पर सवर्णों के आर्थिक पिछड़ेपन के अध्ययन और EWS लाभों को जमीन पर उतारने के लिए आयोग काम कर सकता है, तो केंद्र में यह क्यों संभव नहीं है।

सांसदों का पक्ष और मांग का आधार

  • EWS और आर्थिक पिछड़ेपन की निगरानी: सांसदों का कहना है कि सवर्ण जातियों में भी एक बड़ा वर्ग आर्थिक तंगी, बेरोजगारी और सामाजिक असमानता से जूझ रहा है। EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) के 10 प्रतिशत कोटे के उचित क्रियान्वयन, प्रमाणपत्रों की जटिलता, आयु सीमा में समानता और छात्रवृत्ति जैसी समस्याओं को सुनने के लिए कोई समर्पित मंच नहीं है।

  • शिकायतों के निपटारे का माध्यम: जब भी सामान्य वर्ग के युवाओं या छात्रों के साथ कोई नीतिगत विसंगति होती है, तो उनके पास सीधे अपील करने के लिए कोई विशिष्ट आयोग नहीं होता, जबकि अन्य वर्गों के पास वैधानिक संस्थागत ढांचा मौजूद है।

  • संवैधानिक अथवा कार्यकारी दर्जा: मांग की जा रही है कि संसद में विधेयक लाकर इसे वैधानिक या 102वें संविधान संशोधन (जिससे OBC आयोग को संवैधानिक दर्जा मिला) की तरह मजबूत संस्थागत ढांचा प्रदान किया जाए।

संसद की मौजूदा सामाजिक संरचना: कुल सांसद और सवर्णों की भागीदारी

18वीं लोकसभा (कुल 543 सदस्य) में जातियों के प्रतिनिधित्व की स्थिति:

  • कुल लोकसभा सीटें: 543

  • आरक्षित सीटें: 131 (अनुसूचित जाति के लिए 84 और अनुसूचित जनजाति के लिए 47 सीटें)

  • अनारक्षित (सामान्य) सीटें: 412

  • सवर्ण सांसदों की कुल संख्या: 18वीं लोकसभा में चुनकर आए सांसदों में लगभग 140 सांसद (करीब 25.8%) सवर्ण (ब्राह्मण, राजपूत/ठाकुर, वैश्य/बनिया, भूमिहार, कायस्थ आदि) हैं।

    (यह संख्या 17वीं लोकसभा के मुकाबले घटी है, जहां सवर्ण सांसदों की हिस्सेदारी लगभग 28 से 30 प्रतिशत थी। इस बार संसद में ओबीसी सांसदों की तादाद बढ़कर 138 तक पहुंची है, जबकि मध्यवर्ती/कृषक जातियों के लगभग 74 सांसद हैं।)

प्रमुख दलों में सांसदों की कुल संख्या और सवर्ण प्रतिनिधित्व का अनुमानित गणित

राजनीतिक दल कुल सांसद (18वीं लोकसभा) सवर्ण सांसद (अनुमानित संख्या) मुख्य सवर्ण जातियां/विशेष विवरण
भारतीय जनता पार्टी (BJP) 240 85 – 90 ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य और भूमिहार सांसदों का सबसे बड़ा हिस्सा बीजेपी में है।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) 99 20 – 22 उत्तर भारत, मध्य प्रदेश, हिमाचल, केरल और दक्षिण के राज्यों से चुनकर आए सामान्य वर्ग के नेता।
समाजवादी पार्टी (SP) 37 4 – 5 सपा की ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति के बावजूद 4 से 5 सामान्य वर्ग सांसद जीते।
तृणमूल कांग्रेस (AITC) 29 8 – 10 पश्चिम बंगाल के ब्राह्मण, कायस्थ और बैद्य समुदाय के सांसद शामिल।
तेलुगु देशम पार्टी (TDP) 16 6 – 7 कम्मा, रेड्डी और तटीय आंध्र के गैर-आरक्षित वर्गों के सांसद।
जनता दल (यूनाइटेड) 12 3 – 4 भूमिहार (राजीव रंजन/ललन सिंह), राजपूत (लवली आनंद) आदि।
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) 5 2 वैश्य और राजपूत वर्ग के प्रतिनिधि।
अन्य दल व निर्दलीय 105 10 – 12 शिवसेना, एनसीपी और निर्दलीय मिलाकर।

सवर्ण आयोग की यह नई सुगबुगाहट आगामी विधानसभा चुनावों और देश में चल रही सामाजिक न्याय व जातीय जनगणना की सियासत के बीच एक नए राजनीतिक संतुलन का संकेत दे रही है।

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