‘कोख’ की कीमत पर गन्ने की मिठास: महाराष्ट्र के बीड में महिला मजदूरों की हिस्टेरेक्टॉमी का कड़वा सच
Sugarcane Workers. चीनी की जिस मिठास का स्वाद पूरा देश चखता है, उसके पीछे महाराष्ट्र के बीड जिले की हजारों महिला मजदूरों के दर्द और लाचारी की कड़वी दास्तां छिपी है। गन्ने के खेतों में 14-14 घंटे की कमरतोड़ मजदूरी, माहवारी के दौरान छुट्टी लेने पर भारी आर्थिक जुर्माना और खेतों में शौचालय-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव—इन सबने बीड की हजारों युवा महिलाओं को एक बेहद दर्दनाक रास्ते पर धकेल दिया है।
महज 25 से 35 साल की उम्र में ये महिलाएं अपने गर्भाशय को ऑपरेशन के जरिए निकलवाने (हिस्टेरेक्टॉमी) को मजबूर हैं, ताकि न माहवारी का दर्द काम रोके और न ही ठेकेदार का जुर्माना उनकी रोजी-रोटी छीने। स्वास्थ्य संकट, आर्थिक शोषण और निजी क्लीनिकों के मुनाफे के इस गठजोड़ ने बीड को ‘बिना कोख वाली महिलाओं के जिले’ के एक खौफनाक सच में तब्दील कर दिया है।
हिस्टेरेक्टॉमी (Hysterectomy) क्या है?
हिस्टेरेक्टॉमी एक प्रमुख सर्जिकल प्रक्रिया है जिसमें महिला के शरीर से गर्भाशय (Uterus/Womb) को ऑपरेशन के जरिए निकाल दिया जाता है। चिकित्सीय रूप से यह सर्जरी केवल अत्यधिक गंभीर स्थितियों में की जाती है—जैसे गर्भाशय का कैंसर (Uterine Cancer), अनियंत्रित अत्यधिक रक्तस्राव, गंभीर फाइब्रॉएड (Fibroids) या गर्भाशय का अपनी जगह से खिसक जाना (Uterine Prolapse)। सामान्य या हल्के संक्रमणों के लिए यह सर्जरी कभी भी पहला विकल्प नहीं होती।
गन्ने की फसल और मजदूरी से इसका संबंध
महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त मराठवाड़ा क्षेत्र, विशेष रूप से बीड जिले से लाखों मौसमी मजदूर पश्चिमी महाराष्ट्र और कर्नाटक के गन्ना बेल्ट में कटाई के लिए प्रवास करते हैं। इस मजदूरी व्यवस्था में हिस्टेरेक्टॉमी का संबंध सीधे तौर पर आर्थिक शोषण और बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जुड़ा हुआ है:
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‘जोड़ी’ प्रणाली और काम का दबाव: ठेकेदार (मुकादम) पति-पत्नी को एक ‘जोड़ी’ के रूप में काम पर रखते हैं और सीजन की शुरुआत में अग्रिम (एडवांस) रकम देते हैं।
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काम से गैरहाजिरी पर भारी जुर्माना: रोजाना 12 से 16 घंटे तक भारी गन्ने के गट्ठर उठाने पड़ते हैं। मासिक धर्म (पीरियड्स), प्रसव या बीमारी के कारण यदि महिला एक दिन भी काम पर नहीं जाती, तो ठेकेदार प्रतिदिन ₹500 से ₹1,000 तक का जुर्माना लगाते हैं, जो उनकी दैनिक मजदूरी से भी अधिक होता है।
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शौचालय व स्वच्छता का अभाव: खेतों में काम के दौरान साफ पानी, शौचालय और सैनिटरी पैड जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं होतीं। गंदे कपड़े और दूषित पानी के इस्तेमाल से महिलाओं में बार-बार यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (UTI) और पेल्विक इंफेक्शन होते हैं।
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मासिक धर्म के झंझट और जुर्माने से मुक्ति: बार-बार के दर्द, संक्रमण और काम छूटने के डर से बचने के लिए कई महिलाएं गर्भाशय को ही शरीर से हमेशा के लिए निकलवाने का रास्ता चुनती हैं।
बीड को लेकर किसने पेश की रिपोर्ट और क्या है रिपोर्ट में?
इस मुद्दे पर पहली बार व्यापक आधिकारिक रिपोर्ट वर्ष 2019 में महाराष्ट्र विधान परिषद की उपसभापति डॉ. नीलम गोऱ्हे की अध्यक्षता में गठित 7-सदस्यीय उच्चस्तरीय जांच समिति ने तैयार कर सरकार को सौंपी थी। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग, राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) और स्वतंत्र मानवाधिकार संगठनों ने लगातार रिपोर्टें जारी की हैं।
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चौंकाने वाले आंकड़े: 82,000 से अधिक महिला मजदूरों के सर्वेक्षण में पाया गया कि लगभग 13,800 से अधिक महिलाओं (करीब 17% से 36% तक) ने हिस्टेरेक्टॉमी कराई थी, जबकि राष्ट्रीय औसत महज 3.2% है।
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कम उम्र में सर्जरी: रिपोर्ट के अनुसार, 30 से 35 वर्ष की युवा महिलाएं, जिन्होंने 2-3 बच्चे पैदा कर लिए थे, उन्हें इस ऑपरेशन के लिए प्रेरित किया गया। कुछ मामलों में 25 वर्ष से कम आयु की महिलाओं की भी सर्जरी दर्ज हुई।
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निजी अस्पतालों की संदेहास्पद भूमिका: रिपोर्ट में रेखांकित किया गया कि कई स्थानीय निजी क्लीनिक और डॉक्टर छोटे-मोटे संक्रमण या पेट दर्द को ‘कैंसर का खतरा’ बताकर महिलाओं को डराते हैं और कमाई के लिए अनावश्यक हिस्टेरेक्टॉमी कर देते हैं।
बिना जरूरत गर्भाशय निकलवाने के गंभीर खतरे
विशेषज्ञों के अनुसार, समय से पहले गर्भाशय और अंडाशय निकाल दिए जाने से महिलाओं के स्वास्थ्य पर अपरिवर्तनीय नुकसान होते हैं:
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हड्डियों की कमजोरी (Osteoporosis): एस्ट्रोजन हार्मोन की अचानक कमी से हड्डियां खोखली और कमजोर हो जाती हैं, जिससे जोड़ों में असहनीय दर्द होता है।
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समय पूर्व रजोनिवृत्ति (Premature Menopause): अचानक हार्मोनल बदलाव से मानसिक तनाव, अवसाद, अनिद्रा और दिल की बीमारियों का जोखिम बढ़ जाता है।
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शारीरिक क्षमता में कमी: भारी वजन उठाने की क्षमता घट जाती है, जिससे मजदूरी करना पहले से अधिक कष्टदायक हो जाता है।
रोकथाम और जागरूकता के जरूरी कदम
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मानक संचालन प्रक्रिया (SOP): सरकार ने निजी व सरकारी अस्पतालों में बिना जिला सिविल सर्जन/समिति की पूर्व स्वीकृति के हिस्टेरेक्टॉमी करने पर कड़े दिशा-निर्देश लागू किए हैं।
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श्रमिक सुरक्षा व स्वास्थ्य कार्ड: गन्ना मजदूरों के लिए कार्यस्थल पर अनिवार्य शौचालय, स्वच्छ पेयजल, स्वास्थ्य जांच और मातृत्व व मासिक धर्म राहत का कानूनी प्रावधान सुनिश्चित करना आवश्यक है।
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समुदाय स्तर पर काउंसलिंग: ग्रामीण महिलाओं को यह समझाना जरूरी है कि गर्भाशय कोई व्यर्थ अंग नहीं है और सामान्य संक्रमणों का इलाज साधारण दवाओं व स्वच्छता से पूरी तरह संभव है।

