AI ने बताया छत्तीसगढ़ सरकार की किन मुद्दों पर हो रही छीछालेदर, सरकार का इन पर ध्यान ही नहीं

Challenge of CG Government. छत्तीसगढ़ में वर्तमान विष्णुदेव साय सरकार वैसे तो अपनी महत्वाकांक्षी योजनाओं (जैसे कृषक उन्नति योजना और महतारी वंदन योजना) को लेकर जनता के बीच सक्रिय है, लेकिन लोकतांत्रिक राजनीति और विपक्षी विमर्श में कुछ ऐसे प्रमुख मुद्दे हैं, जिन पर सरकार की घेराबंदी हो रही है और प्रशासनिक छवि पर सवाल उठाए जा रहे हैं।मुख्य रूप से निम्नलिखित मुद्दों पर सरकार को आलोचना या प्रशासनिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है:

1. कानून-व्यवस्था और अपराध (Law and Order)

विपक्ष और आलोचकों द्वारा सबसे ज्यादा हमला कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर किया जा रहा है।

  • बढ़ते अपराध: राज्य के कुछ जिलों (जैसे कवर्धा और मैदानी इलाकों) में चोरी, हत्या, और आपसी रंजिश के मामलों को लेकर विपक्ष लगातार सरकार को घेर रहा है।
  • बलौदाबाजार जैसी घटनाएं: अतीत में हुई बलौदाबाजार की आगजनी जैसी बड़ी घटनाओं और कुछ स्थानीय विवादों को लेकर प्रशासनिक विफलता के आरोप लगे हैं, जिससे सरकार की ‘सख्त कानून-व्यवस्था’ वाली छवि पर असर पड़ा है।

2. धर्मांतरण कानून और डीलिस्टिंग का विवाद

सरकार द्वारा हाल ही में लाए गए सख्त फैसलों ने राजनीतिक और सामाजिक माहौल गरमा दिया है।

  • कड़ा धर्मांतरण कानून: सरकार द्वारा पारित किया गया ‘छत्तीसगढ़ स्वतंत्रता धर्म विधेयक 2026’ (Freedom of Religion Bill 2026) काफी चर्चा और विवादों में रहा। जहां सरकार इसे अवैध धर्मांतरण रोकने के लिए जरूरी बता रही है, वहीं विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इसमें दी गई कड़ी सजाएं और 60 दिन पहले सूचना देने जैसे नियम नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं।
  • डीलिस्टिंग (Delisting) का मुद्दा: आदिवासी समाज के एक वर्ग द्वारा धर्म बदलने वाले आदिवासियों को आरक्षण की सूची से बाहर करने (डीलिस्टिंग) की मांग तेज हो गई है। मुख्यमंत्री द्वारा इसके समर्थन में दिए गए बयानों के बाद, इस मुद्दे पर आदिवासी समाज और राजनीतिक गलियारों में ध्रुवीकरण और तीखी बहस छिड़ गई है।

3. ग्रामीण इलाकों में अघोषित बिजली कटौती

छत्तीसगढ़ को एक बिजली सरप्लस राज्य माना जाता रहा है, लेकिन पिछले कुछ समय से ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों से शिकायतें आ रही हैं।

  • घोषित और अघोषित कटौती: खेती के पीक सीजन और गर्मी के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में अघोषित बिजली कटौती को लेकर किसान और ग्रामीण असंतुष्ट दिखे हैं। विपक्ष इसे मुद्दा बनाकर सरकार की ‘कृषि समृद्धि’ के दावों पर सवाल उठा रहा है।

4. प्रशासनिक फैसलों पर ‘यू-टर्न’ (U-Turn on Policy Decisions)

प्रशासनिक स्तर पर कुछ फैसलों को लेकर सरकार की नीतिगत स्पष्टता पर सवाल उठे हैं।

  • सरकारी कर्मचारियों पर प्रतिबंध और वापसी: सरकार ने एक आदेश जारी कर सरकारी कर्मचारियों के किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधियों या पदों पर रहने पर सख्त रोक लगाने की चेतावनी दी थी। लेकिन व्यापक विरोध और विपक्षी दबाव के चलते महज 24 घंटे के भीतर इस आदेश को वापस लेना पड़ा। इस तरह के यू-टर्न को विपक्ष सरकार की ‘कमजोर प्रशासनिक पकड़’ के रूप में पेश कर रहा है।

5. सोसाइटियों से धान का उठाव और अमानक बीज

हालांकि सरकार 3100 रुपये प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदकर किसानों के बीच अपनी मजबूत पैठ बना चुकी है, लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ व्यावहारिक दिक्कतें सामने आई हैं।

  • उठाव में देरी: धान संग्रहण केंद्रों और सोसाइटियों से समय पर धान का उठाव न होने के कारण कुछ जगहों पर अव्यवस्था देखी गई।
  • अमानक कृषि इनपुट: कुछ ग्रामीण अंचलों से किसानों द्वारा अमानक (कम गुणवत्ता वाले) बीज और खाद की आपूर्ति की शिकायतें उठाई गई हैं, जो कृषि प्रधान राज्य में एक संवेदनशील मुद्दा बन जाता है।

निष्कर्ष: सरकार जहां एक तरफ ‘सुशासन’ और ‘सांय-सांय काम’ (तेज विकास) का नैरेटिव सेट करने की कोशिश कर रही है, वहीं कानून-व्यवस्था, बिजली की स्थिति, और वैचारिक/सामाजिक रूप से संवेदनशील कानून (धर्मांतरण व डीलिस्टिंग) ऐसे मोर्चे हैं जहां सरकार को जनता और विपक्ष के तीखे सवालों का सामना करना पड़ रहा है।