पूर्वोत्तर के आदिवासियों को क्यों नहीं देना पड़ता एक भी रुपया इनकम टैक्स? क्या है कानून, और किसे मिली है छूट
Income Tax Exemption in India. भारत में हर कमाऊ नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह अपनी आय के अनुसार सरकार को टैक्स दे, ताकि देश का विकास हो सके। लेकिन, भारतीय आयकर कानून (Income Tax Act, 1961) में कई ऐसे प्रावधान हैं, जिनके तहत कुछ विशेष वर्गों, क्षेत्रों या आय के प्रकारों पर इनकम टैक्स में पूरी तरह से छूट दी गई है। अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि टैक्स में यह छूट किसे, क्यों और किस आधार पर मिलती है? विशेषकर पूर्वोत्तर (North-East) भारत के आदिवासी समुदायों को मिलने वाली टैक्स छूट को लेकर कई बार यह बहस छिड़ जाती है कि क्या यह देश के बाकी करदाताओं के साथ अन्याय है? आइए, इस मुद्दे को विस्तार से समझते हैं।
भारत में इनकम टैक्स में छूट किसे मिलती है?
आम तौर पर, भारत में एक निश्चित सीमा से अधिक आय वाले हर व्यक्ति को टैक्स देना होता है। लेकिन कुछ आय पूरी तरह से टैक्स-फ्री (Tax-Free) होती हैं, जैसे:
- कृषि आय (Agricultural Income): आयकर अधिनियम की धारा 10(1) के तहत खेती से होने वाली आय पूरी तरह से कर-मुक्त है, क्योंकि कृषि राज्य का विषय है और इसे बढ़ावा देना सरकार की प्राथमिकता है।
- HUF (हिंदू अविभाजित परिवार) की आय: HUF से मिलने वाली कुछ विशिष्ट आय।
- विशिष्ट भत्ते और रिटायरमेंट फंड: जैसे ग्रेच्युटी, पीएफ (PF) का पैसा, और वीआरएस (VRS) का पैसा (निश्चित सीमा तक)।
पूर्वोत्तर के आदिवासियों को मिलने वाली विशेष छूट (Section 10(26))
हाँ, यह बिल्कुल सच है कि पूर्वोत्तर के राज्यों में रहने वाले विशिष्ट आदिवासी समुदायों को इनकम टैक्स में 100% की छूट दी जाती है। इसका मुख्य आधार आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 10(26) है।
क्या है यह कानून? इस धारा के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति अनुसूचित जनजाति (ST – Scheduled Tribe) का सदस्य है और वह निम्नलिखित क्षेत्रों का निवासी है, तो उसे अपनी आय पर कोई इनकम टैक्स नहीं देना होता:
- संविधान की छठी अनुसूची (Sixth Schedule) में शामिल क्षेत्र (असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम के आदिवासी क्षेत्र)।
- अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा राज्य।
- लद्दाख।
छूट की शर्तें:
- व्यक्ति का अनुसूचित जनजाति (ST) का प्रमाणिक सदस्य होना अनिवार्य है।
- उसकी आय उसी विशिष्ट क्षेत्र (North-East) के भीतर किसी स्रोत से उत्पन्न होनी चाहिए, या उसे लाभांश (Dividend) और ब्याज से आय प्राप्त हो रही हो।
- ध्यान दें: यदि वह व्यक्ति दिल्ली, मुंबई या इस क्षेत्र के बाहर जाकर नौकरी या व्यापार करता है, तो उसे सामान्य नागरिक की तरह ही टैक्स देना होगा।
इस छूट का आधार क्या है?
इस भारी भरकम छूट के पीछे कोई राजनीतिक तुष्टिकरण नहीं, बल्कि गहरी संवैधानिक और ऐतिहासिक वजहें हैं:
- ऐतिहासिक अलगाव: स्वतंत्रता के समय पूर्वोत्तर के कई इलाके देश की मुख्यधारा से कटे हुए थे। वहां बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था का विकास बहुत कम था।
- आर्थिक पिछड़ापन: इन आदिवासी क्षेत्रों का आर्थिक सशक्तीकरण करने और उन्हें मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था में बिना किसी आर्थिक बोझ के शामिल करने के लिए यह रियायत दी गई।
- संवैधानिक संरक्षण: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 46 और छठी अनुसूची जनजातीय आबादी के आर्थिक हितों की रक्षा और उनके शोषण को रोकने का निर्देश देते हैं।
कानून की नजर में यह न्यायसंगत क्यों है?
- अनुच्छेद 14 और युक्तिसंगत वर्गीकरण (Reasonable Classification): भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार देता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि समानता का मतलब “समान लोगों के साथ समान व्यवहार” है। जो वर्ग ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप से पिछड़े रहे हैं, उन्हें समान धरातल पर लाने के लिए कानून अलग से बनाए जा सकते हैं।
- समानता बनाम समता (Equality vs Equity): यदि रेस में एक धावक 100 मीटर पीछे से दौड़ना शुरू कर रहा है, तो उसे आगे वाले के बराबर लाने के लिए कुछ रियायत देनी ही होगी। पूर्वोत्तर के आदिवासियों को दी गई यह छूट उसी ‘समता’ (Equity) का परिचायक है।
- क्षेत्र का विकास: इस छूट का मकसद यह है कि वहां के लोग अपनी पूंजी को उसी क्षेत्र के विकास, व्यापार और रोजगार सृजन में लगाएं, जिससे उस दुर्गम इलाके का समग्र विकास हो सके।

