प्रत्यर्पण संधि क्या है? ओमान से लाए गए महादेव ऐप के सौरभ चंद्राकर पर क्यों लागू होंगे खास नियम
Extradition Treaty. जब भी कोई बड़ा अपराधी देश में कोई बड़ा घोटाला या अपराध करके विदेश भाग जाता है, तो उसे वापस लाने के लिए ‘प्रत्यर्पण संधि’ (Extradition Treaty) का इस्तेमाल किया जाता है। हाल ही में महादेव सट्टा ऐप (Mahadev Betting App) के प्रमोटर सौरभ चंद्राकर का मामला काफी चर्चा में है, जिसे विदेश (ओमान/यूएई) से भारत लाया गया है।
लेकिन क्या आप जानते हैं कि विदेश से लाए गए अपराधी के साथ हमारी पुलिस वैसा बर्ताव नहीं कर सकती, जैसा वह देश में पकड़े गए किसी आम अपराधी के साथ करती है? आइए इसे विस्तार से समझते हैं।
क्या होती है प्रत्यर्पण संधि?
प्रत्यर्पण संधि दो देशों के बीच एक कानूनी समझौता होता है। इसके तहत, यदि किसी एक देश का अपराधी अपराध करके दूसरे देश में छिप जाता है, तो पहला देश कानूनी सबूतों के साथ दूसरे देश से उस अपराधी को सौंपने की मांग करता है। भारत की ओमान, यूएई, अमेरिका और ब्रिटेन सहित कई देशों के साथ यह संधि है।
अपराधी को सौंपने की शर्तें
कोई भी देश किसी व्यक्ति को तब तक नहीं सौंपता जब तक कुछ खास शर्तें पूरी न हों:
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दोहरा अपराध सिद्धांत (Dual Criminality): जिस जुर्म के लिए व्यक्ति को मांगा जा रहा है, वह जुर्म दोनों देशों के कानून में अपराध होना चाहिए। (जैसे धोखाधड़ी और मनी लॉन्ड्रिंग भारत और ओमान दोनों में अपराध है)।
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राजनीतिक या सैन्य अपराध न हो: राजनीतिक विरोधियों या सैन्य अपराध के मामलों में प्रत्यर्पण नहीं होता है।
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सजा-ए-मौत पर रोक: कई देश यह शर्त रखते हैं कि प्रत्यर्पित किए जा रहे व्यक्ति को फांसी की सजा नहीं दी जाएगी।
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क्या प्रत्यर्पित व्यक्ति को असीमित समय तक हिरासत में रखा जा सकता है?
किसी भी प्रत्यर्पित अपराधी को कोई भी देश अपने यहां असीमित समय के लिए बिना मुकदमे के हिरासत में नहीं रख सकता। उसे देश के सामान्य कानूनों (जैसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना, चार्जशीट दाखिल करने की समय सीमा) का ही पालन करते हुए न्यायिक हिरासत या पुलिस रिमांड में रखा जाता है। अगर तय समय में जांच एजेंसियां सबूत पेश नहीं कर पाती हैं, तो उसे भी जमानत पाने का अधिकार होता है।
सौरभ चंद्राकर के मामले में कौन सा नियम लागू होगा?
महादेव सट्टा ऐप के संचालक सौरभ चंद्राकर को भारत लाने पर अंतरराष्ट्रीय कानून का सबसे अहम नियम लागू होगा, जिसे ‘विशिष्टता का सिद्धांत’ (Doctrine of Specialty) कहा जाता है। इस नियम के अनुसार, ओमान या जिस भी देश से उसे प्रत्यर्पित करके लाया जा रहा है, भारत सरकार ने उस देश को जो डोजियर (अपराधों की सूची और एफआईआर) सौंपी है, चंद्राकर पर केवल उन्हीं मामलों में मुकदमा चलाया जा सकता है।
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देश के अपराधी और प्रत्यर्पित अपराधी में क्या अंतर होता है?
इसे एक आसान उदाहरण से समझते हैं:
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देश का आम अपराधी: मान लीजिए, भारत की पुलिस ने दिल्ली से एक चोर को पकड़ा। पूछताछ में पता चला कि उसने 5 साल पहले मुंबई में भी चोरी की थी और भोपाल में किसी से मारपीट की थी। पुलिस उस पर उन सभी पुराने मामलों में तुरंत नई एफआईआर दर्ज करके कार्रवाई कर सकती है। उस पर कोई भी नई धारा लगाई जा सकती है।
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प्रत्यर्पित अपराधी (जैसे सौरभ चंद्राकर): अगर सौरभ चंद्राकर को प्रत्यर्पण संधि के तहत लाया जाता है, तो भारतीय एजेंसियां (ED या पुलिस) उस पर केवल वही केस चला सकती हैं जिनकी जानकारी प्रत्यर्पण के समय ओमान/विदेशी सरकार को दी गई थी। यदि भारत लाने के बाद पता चलता है कि उसने कोई और भी अपराध (जैसे कोई पुरानी हत्या या कोई नया घोटाला) किया था जिसका जिक्र प्रत्यर्पण फाइल में नहीं था, तो पुलिस उस पर सीधे वह नया केस नहीं थोप सकती। नए केस में मुकदमा चलाने के लिए भारत सरकार को फिर से उस देश (जहां से उसे लाया गया है) से विशेष अनुमति लेनी पड़ेगी।
यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय अपराधियों को भारत लाना और उन्हें सजा दिलाना एक बेहद जटिल और लंबी कानूनी प्रक्रिया होती है, जिसमें हर कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ता है।

