DPDP Act vs भारतीय मीडिया: क्या न्यूजरूम पर लग जाएंगे ताले ? जानिए क्यों सुप्रीम कोर्ट पहुंचे 21 मीडिया हाउस!
DPDP Act 2023. क्या आपने कभी सोचा है कि आपके मोबाइल नंबर, आपके मैसेज, आपके इंटरनेट सर्च और आपकी व्यक्तिगत जानकारियों का कंपनियां क्या करती हैं? इसी ‘डेटा की सेंधमारी’ को रोकने के लिए भारत सरकार डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट (DPDP Act) 2023 लेकर आई है।
सीधे शब्दों में कहें तो अब कोई भी कंपनी, ऐप या संस्थान आपकी मर्जी के बिना आपका पर्सनल डेटा न तो इकट्ठा कर सकता है और न ही उसे कहीं और बेच सकता है। ऐसा करने पर उन पर भारी-भरकम जुर्माने (250 करोड़ रुपये तक) का प्रावधान है।
आम नागरिकों के लिए तो यह बड़ी राहत है, लेकिन देश के 21 बड़े मीडिया हाउसेस (डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन – DNPA) ने इसके खिलाफ सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा दिया है। उनका कहना है कि यह कानून भले ही जनता की भलाई के लिए दिख रहा हो, लेकिन इसकी आड़ में मीडिया और खोजी पत्रकारिता (Investigative Journalism) का दम घुट जाएगा।
आखिर मीडिया को क्या दिक्कत है? समझिए 4 बड़े कारण:
1. ‘सहमति’ का पेच: खोजी पत्रकारिता कैसे होगी? : DPDP कानून कहता है कि किसी भी व्यक्ति का डेटा (जैसे नाम, फोन नंबर, पता, बैंक डिटेल्स या कोई भी व्यक्तिगत जानकारी) इस्तेमाल करने से पहले उसकी लिखित या डिजिटल सहमति (Consent) लेना अनिवार्य है।
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मीडिया की चिंता: अब मान लीजिए कोई पत्रकार किसी भ्रष्ट नेता, घोटालेबाज या अपराधी के खिलाफ स्टिंग या खोजी रिपोर्ट कर रहा है। क्या कोई अपराधी अपनी पोल खोलने के लिए पत्रकार को अपना ‘डेटा’ इस्तेमाल करने की ‘सहमति’ देगा? बिल्कुल नहीं! अगर बिना सहमति के खबर छापी गई, तो मीडिया हाउस पर करोड़ों का जुर्माना ठोक दिया जाएगा।
2. RTI (सूचना का अधिकार) पर भी लग गया ताला : DPDP एक्ट ने RTI अधिनियम की धारा 8(1)(j) को भी प्रभावित किया है। अब सरकारी अधिकारी ‘व्यक्तिगत जानकारी’ और ‘निजता’ का हवाला देकर पत्रकारों या आम लोगों को कई जरूरी जानकारियां देने से मना कर सकते हैं। इससे सरकारी कामकाज में पारदर्शिता खत्म होने का डर है।
3. ‘पत्रकारिता’ को छूट क्यों नहीं? : दुनियाभर के डेटा सुरक्षा कानूनों (जैसे यूरोपीय संघ का GDPR) में पत्रकारों और मीडिया को विशेष छूट (Exemptions) दी गई है, ताकि वे जनहित में काम कर सकें। लेकिन भारत के DPDP एक्ट में मीडिया को ऐसी कोई स्पष्ट छूट नहीं मिली है।
4. भारी-भरकम जुर्माना: ‘न्यूजरूम पर ताला’ लगाने का खतरा : इस कानून के तहत नियमों का उल्लंघन करने पर 50 करोड़ से लेकर 250 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है। मीडिया हाउसेस का कहना है कि इतने बड़े जुर्माने से छोटे और मध्यम मीडिया संस्थान तो एक ही झटके में दिवालिया हो जाएंगे और न्यूजरूम्स को बंद करना पड़ जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट में क्या चल रहा है?
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। डिजिटल मीडिया पब्लिशर्स का पक्ष रख रहे वकीलों ने कोर्ट में साफ कहा, “यदि खोजी पत्रकारिता को इस कानून के कड़े नियमों से अलग नहीं रखा गया, तो जनहित की पत्रकारिता पूरी तरह खत्म हो जाएगी और पत्रकार सिर्फ सरकारी प्रेस रिलीज छापने को मजबूर हो जाएंगे।”
क्या है इसका समाधान?
विशेषज्ञों का मानना है कि प्राइवेसी और प्रेस की स्वतंत्रता दोनों ही लोकतंत्र के लिए जरूरी हैं। ऐसे में सरकार को कानून में संशोधन कर या नियमों के तहत ‘पत्रकारिता’ और ‘जनहित के खुलासों’ को इस कानून के कड़े दायरे से बाहर रखना होगा, ताकि निजता भी बची रहे और सच दिखाने वाली पत्रकारिता की आवाज भी न दबे।

