सरगुजा संभाग में छात्रों की आत्महत्या के आंकड़े डराने वाले, 2025 में 123 ने दी जान; 2026 में अब तक 81 मामले

Student Suicides in Surguja. पढ़ाई में अच्छे अंक लाने की होड़, परीक्षा में असफल होने का डर, अभिभावकों की अपेक्षाएं और सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव। क्या इन सबके बीच विद्यार्थियों पर मानसिक दबाव इतना बढ़ रहा है कि वे जिंदगी से ही हार मानने लगे हैं? सरगुजा संभाग से सामने आए विद्यार्थियों की आत्महत्या के आंकड़े इस सवाल को गंभीर बना रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025 में संभाग के छह जिलों में 123 छात्र-छात्राओं ने आत्महत्या की, जबकि वर्ष 2026 में जनवरी से अब तक यह संख्या 81 तक पहुंच गई है। इन आंकड़ों ने बच्चों की मानसिक सेहत, स्कूलों में काउंसलिंग की व्यवस्था और अभिभावकों की भूमिका को लेकर गंभीर बहस छेड़ दी है।

हाल ही में सामने आए दो मामले इस चिंता को और गहरा करते हैं। एक मामले में दसवीं की छात्रा ने पिता की डांट के बाद आत्महत्या कर ली, जबकि दूसरे मामले में बारहवीं की छात्रा ने परीक्षा खराब होने और कम अंक आने के बाद स्कूल की छत पर चढ़कर आत्महत्या की कोशिश की। ये घटनाएं बताती हैं कि कुछ परिस्थितियों में बच्चों के लिए छोटी दिखने वाली बात भी असहनीय मानसिक दबाव का कारण बन सकती है। हालांकि, किसी भी आत्महत्या या प्रयास के पीछे एक ही कारण मान लेना उचित नहीं है। मानसिक स्वास्थ्य, पारिवारिक परिस्थितियां, पढ़ाई का दबाव और दूसरे व्यक्तिगत कारण भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

छह जिलों में सामने आए चौंकाने वाले आंकड़े

सरगुजा संभाग में वर्ष 2025 के दौरान छात्र-छात्राओं की आत्महत्या के मामलों का जिलेवार विवरण इस प्रकार है।

  • सरगुजा: 52 मामले
  • जशपुर: 27 मामले
  • सूरजपुर: 17 मामले
  • कोरिया: 10 मामले
  • बलरामपुर: 10 मामले
  • एमसीबी: 9 मामले

इन आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में कुल 123 छात्र-छात्राओं ने आत्महत्या की। वहीं, वर्ष 2026 में जनवरी से अब तक 81 मामले सामने आने की जानकारी दी गई है।

इस वर्ष के जिलेवार आंकड़ों पर नजर डालें तो सरगुजा में 24, जशपुर में 17, एमसीबी में 14, बलरामपुर में 10, सूरजपुर में 9 और कोरिया में 7 मामले दर्ज किए गए हैं।

वर्ष 2026 के ये आंकड़े पूरे साल के नहीं, बल्कि जनवरी से रिपोर्ट तैयार किए जाने तक की अवधि के हैं। इसलिए इनकी तुलना पिछले साल के पूरे आंकड़े से करते समय समयावधि का ध्यान रखना जरूरी है। साथ ही, इन संख्याओं को प्रमाणित करने के लिए संबंधित विभागों के आधिकारिक रिकॉर्ड और मामलों के वर्गीकरण की पुष्टि भी आवश्यक है।

अंकों की दौड़ में कहीं पीछे तो नहीं छूट रहा बच्चों का मानसिक स्वास्थ्य?

आज के प्रतिस्पर्धात्मक माहौल में विद्यार्थियों पर बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव लगातार महसूस किया जाता है। अच्छे अंक, पसंदीदा विषय, करियर का चुनाव और भविष्य की चिंता कई बच्चों के लिए तनाव का कारण बन सकते हैं। जब इस दबाव के साथ अभिभावकों की अपेक्षाएं और असफलता का डर जुड़ जाता है, तो कुछ बच्चे अपनी परेशानियां खुलकर साझा नहीं कर पाते।

काउंसलर शिल्पा पांडे के अनुसार, विद्यार्थियों पर अंकों के साथ-साथ करियर और अभिभावकों की अपेक्षाओं का दबाव भी पड़ता है। ऐसे में बच्चों की परेशानियों को समय रहते समझना और उन्हें उचित मार्गदर्शन देना जरूरी है।

विशेषज्ञों के नजरिये से सबसे अहम सवाल यह है कि क्या बच्चों को यह भरोसा मिल पा रहा है कि कम अंक आने, परीक्षा खराब होने या अभिभावकों की नाराजगी के बावजूद उनका भविष्य खत्म नहीं हो जाता? विद्यार्थियों को यह समझाने की जरूरत है कि परीक्षा और परिणाम जीवन का एक हिस्सा हैं, पूरी जिंदगी नहीं।

क्या सोशल मीडिया भी बढ़ा रहा है दबाव?

सोशल मीडिया आज विद्यार्थियों के जीवन का अहम हिस्सा बन चुका है। यहां दूसरों की उपलब्धियां, बेहतर परिणाम, करियर की सफलता और एक आदर्श जीवन की तस्वीरें अक्सर सामने आती हैं। ऐसे माहौल में कुछ विद्यार्थी अनजाने में अपनी तुलना दूसरों से करने लगते हैं। यह तुलना आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।

हालांकि, सरगुजा संभाग में सामने आए आत्महत्या के मामलों में सोशल मीडिया की भूमिका कितनी है, इसे लेकर अलग से प्रमाणित आंकड़े उपलब्ध होना जरूरी है। इसलिए सभी घटनाओं को सोशल मीडिया से जोड़ना सही नहीं होगा। लेकिन डिजिटल व्यवहार, ऑनलाइन उत्पीड़न, तुलना और सोशल मीडिया के इस्तेमाल से पैदा होने वाले तनाव पर भी स्कूलों और परिवारों को ध्यान देने की जरूरत है।

मानसिक परेशानी को समझने के लिए बातचीत जरूरी

मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. सिद्धार्थ कुमार के अनुसार, मानसिक अवसाद और भावनात्मक परेशानियों से जूझ रहे विद्यार्थियों को समझने के लिए उनसे बातचीत करना और उनकी भावनाओं को गंभीरता से सुनना जरूरी है।

कई बार बच्चे अपनी परेशानी सीधे शब्दों में नहीं बता पाते। चुप रहना, अचानक व्यवहार बदलना, पढ़ाई से दूरी बनाना, लगातार उदास रहना या भविष्य को लेकर निराशा जताना ऐसे संकेत हो सकते हैं जिन पर परिवार और शिक्षकों को ध्यान देना चाहिए। हालांकि, किसी एक संकेत से मानसिक बीमारी का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

बच्चों को डांटने, उनकी तुलना दूसरे विद्यार्थियों से करने या उनकी परेशानी को मामूली बताकर टालने के बजाय उनकी बात सुनना ज्यादा उपयोगी हो सकता है। जरूरत पड़ने पर प्रशिक्षित काउंसलर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मदद लेना भी महत्वपूर्ण है।

शिक्षा विभाग के पास काउंसलरों की कमी

विद्यार्थियों की मानसिक सेहत से जुड़ी इस गंभीर समस्या पर शिक्षा विभाग का पक्ष भी सामने आया है। संयुक्त संचालक डॉ. राजेश कुमार सिंह के अनुसार, विभाग के पास विद्यार्थियों की नियमित काउंसलिंग के लिए पर्याप्त काउंसलर उपलब्ध नहीं हैं। विभाग की ओर से परीक्षा के समय बच्चों को तनाव से राहत देने के लिए स्कूलों में जागरूकता अभियान चलाए जाने की बात कही गई है।

हालांकि, सवाल यह है कि क्या परीक्षा के दौरान चलाए जाने वाले अभियान विद्यार्थियों की मानसिक परेशानियों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं? बच्चों पर पढ़ाई, परिवार या व्यक्तिगत जीवन से जुड़ा दबाव केवल परीक्षा के दिनों में नहीं होता। ऐसे में स्कूलों में नियमित काउंसलिंग, प्रशिक्षित विशेषज्ञों की उपलब्धता और जरूरतमंद विद्यार्थियों की पहचान के लिए प्रभावी व्यवस्था जरूरी दिखाई देती है।

स्कूलों में नियमित काउंसलिंग की जरूरत

काउंसलिंग का उद्देश्य केवल परीक्षा के समय तनाव कम करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को अपनी भावनाएं समझने, समस्याओं को साझा करने और मुश्किल परिस्थितियों से निपटने में मदद करना भी है। इसके लिए स्कूलों में नियमित संवाद सत्र, अभिभावकों के लिए जागरूकता कार्यक्रम और शिक्षकों को मानसिक संकट के संकेत पहचानने का प्रशिक्षण दिया जा सकता है।

इसके साथ ही, विद्यार्थियों को भरोसेमंद शिकायत एवं सहायता व्यवस्था उपलब्ध कराना जरूरी है, ताकि वे बिना डर के अपनी समस्याएं बता सकें। जिन बच्चों में गंभीर मानसिक संकट के संकेत दिखाई दें, उन्हें समय पर पेशेवर सहायता से जोड़ना भी स्कूल प्रबंधन और परिवार की प्राथमिकता होनी चाहिए।

बच्चों को यह भरोसा देना होगा कि जिंदगी अंकों से बड़ी है

सरगुजा संभाग के सामने आए ये आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि बच्चों की मानसिक सेहत को लेकर समय रहते कदम उठाने की जरूरत की ओर इशारा करते हैं। हालांकि, आत्महत्या के मामलों में बढ़ोतरी या गिरावट का निष्कर्ष निकालने के लिए तुलनीय अवधि के प्रमाणित आंकड़ों और विस्तृत विश्लेषण की आवश्यकता है, लेकिन हर मामला अपने आप में गंभीर है।

बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि कम अंक आने पर भी जिंदगी में आगे बढ़ने के कई रास्ते होते हैं। असफलता का मतलब जीवन का अंत नहीं है और मदद मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि साहस है।

अभिभावकों, शिक्षकों, स्कूल प्रबंधन और प्रशासन को मिलकर ऐसा माहौल बनाना होगा, जहां विद्यार्थी अपनी परेशानियां बिना डर और झिझक के साझा कर सकें। क्योंकि बच्चों का भविष्य केवल उनके परीक्षा परिणामों से नहीं, बल्कि उनके सुरक्षित, स्वस्थ और आत्मविश्वास से भरे जीवन से तय होगा।

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