भारत में कुपोषण घटा, लेकिन मोटापा और डायबिटीज बढ़े! आखिर किस दिशा में जा रही नई पीढ़ी की सेहत?
INDIA'S HEALTH PARADOX
INDIA’S HEALTH PARADOX. भारत में स्वास्थ्य से जुड़ी एक ऐसी तस्वीर उभर रही है, जिसमें राहत और चिंता दोनों शामिल हैं। एक तरफ बच्चों में कुपोषण की समस्या कम हो रही है, तो दूसरी तरफ मोटापा, बढ़ता ब्लड शुगर और डायबिटीज जैसी बीमारियां तेजी से स्वास्थ्य चुनौती बन रही हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों स्थितियां एक ही परिवार में देखने को मिल सकती हैं।
एक दादी का बचपन कम भोजन और लगातार बनी रहने वाली चिंता के बीच गुजरा हो सकता है। वहीं, उसी परिवार की नई पीढ़ी को पर्याप्त भोजन मिलने के बावजूद मोटापे और बढ़ते ब्लड शुगर जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। यह अंतर सिर्फ दो पीढ़ियों की जीवनशैली में बदलाव नहीं दिखाता, बल्कि भारत में बदलती स्वास्थ्य जरूरतों की ओर भी इशारा करता है।
बच्चों में कुपोषण के खिलाफ मिली अहम कामयाबी
भारत में बच्चों के पोषण की स्थिति में सुधार के संकेत मिले हैं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, पांच साल से कम उम्र के बच्चों में ठिगनापन (Stunting) का स्तर 2019-21 में 35.5 प्रतिशत से घटकर 2023-24 में 29.3 प्रतिशत रह गया।
ठिगनापन बच्चों की उम्र के हिसाब से कम लंबाई को दर्शाता है। यह लंबे समय तक पर्याप्त पोषण नहीं मिलने और बार-बार संक्रमण जैसी समस्याओं से जुड़ा हो सकता है।
इस गिरावट को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिहाज से अहम माना जा सकता है। बेहतर मातृ पोषण, बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए पोषण कार्यक्रम, सरकारी खाद्य योजनाओं और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में सुधार ऐसे बदलावों में भूमिका निभा सकते हैं।
हालांकि, कुपोषण का स्तर कम होने का मतलब यह नहीं है कि समस्या पूरी तरह खत्म हो गई है। आंकड़े बताते हैं कि बच्चों के पोषण में सुधार के बावजूद बड़ी आबादी के लिए पर्याप्त और संतुलित आहार सुनिश्चित करना अब भी जरूरी है।
दूसरी तरफ तेजी से बढ़ रही मोटापे और हाई ब्लड शुगर की समस्या
जहां बच्चों में कुपोषण कम होने के संकेत हैं, वहीं वयस्कों में मोटापे और ब्लड शुगर से जुड़ी चिंताएं बढ़ रही हैं।
दिए गए आंकड़ों के अनुसार, अधिक वजन या मोटापे से प्रभावित भारतीय महिलाओं का अनुपात 2005-06 में 12.6 प्रतिशत था, जो 2023-24 तक बढ़कर 30.7 प्रतिशत हो गया। यानी दो दशक से भी कम समय में यह हिस्सेदारी दोगुने से ज्यादा हो गई।
इसी अवधि के हालिया आंकड़ों में महिलाओं में हाई ब्लड शुगर का स्तर 13.5 प्रतिशत से बढ़कर 17.8 प्रतिशत और पुरुषों में 15.6 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 21 प्रतिशत बताया गया है।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मोटापा और बढ़ा हुआ ब्लड शुगर टाइप-2 डायबिटीज, हृदय रोग और दूसरी गैर-संचारी बीमारियों के जोखिम से जुड़े हैं।
हालांकि, हाई ब्लड शुगर और डायबिटीज एक ही चीज नहीं हैं। किसी व्यक्ति की वास्तविक स्वास्थ्य स्थिति जानने के लिए उचित जांच और डॉक्टर की सलाह जरूरी होती है।
क्या है कुपोषण का दोहरा बोझ?
जब किसी देश या समुदाय में कुपोषण और मोटापा जैसी समस्याएं एक साथ मौजूद होती हैं, तो इसे ‘कुपोषण का दोहरा बोझ’ (Double Burden of Malnutrition) कहा जाता है।
इसका मतलब है कि एक ओर बच्चों को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पा रहा है, जबकि दूसरी ओर वयस्कों में जरूरत से ज्यादा वजन और उससे जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं।
यह स्थिति एक ही परिवार में भी देखने को मिल सकती है। घर में किसी बच्चे की लंबाई और वजन उम्र के हिसाब से कम हो सकता है, जबकि उसी घर के किसी वयस्क को मोटापे या हाई ब्लड शुगर की समस्या हो सकती है।
कभी-कभी एक ही व्यक्ति अपने जीवन के अलग-अलग चरणों में पोषण की कमी और बाद में मोटापे या मेटाबॉलिक समस्याओं का सामना कर सकता है। हालांकि, ऐसा हर व्यक्ति के साथ हो, यह जरूरी नहीं है।
आखिर क्यों बदल रही है भारत की स्वास्थ्य तस्वीर?
भारत में आर्थिक और सामाजिक बदलावों ने लोगों के खानपान, काम करने के तरीके और रोजमर्रा की गतिविधियों को प्रभावित किया है। यही बदलाव स्वास्थ्य पर अलग-अलग तरह से असर डाल सकते हैं।
1. भोजन की उपलब्धता बढ़ी, लेकिन संतुलित आहार अब भी चुनौती
आर्थिक स्थिति में सुधार और खाद्य योजनाओं के विस्तार से कई परिवारों की भोजन तक पहुंच बेहतर हुई है। लेकिन पर्याप्त कैलोरी मिलना और शरीर को जरूरी पोषक तत्व मिलना दो अलग बातें हैं।
संतुलित आहार में प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और मिनरल्स के साथ उचित मात्रा में ऊर्जा मिलना जरूरी है। सिर्फ पेट भरना हमेशा बेहतर पोषण की गारंटी नहीं देता।
2. बदलती जीवनशैली और शारीरिक गतिविधियों में कमी
शहरीकरण, डेस्क पर बैठकर काम करना, स्क्रीन टाइम बढ़ना और पैदल चलने जैसी गतिविधियों में कमी से कई लोगों की रोजाना की शारीरिक सक्रियता घट सकती है।
जब शरीर की ऊर्जा खपत कम हो और भोजन से मिलने वाली कैलोरी जरूरत से ज्यादा हो, तो वजन बढ़ने का जोखिम बढ़ता है।
3. प्रोसेस्ड फूड और ज्यादा कैलोरी वाले खाने की बढ़ती पहुंच
मीठे पेय, ज्यादा नमक या चीनी वाले पैकेज्ड खाद्य पदार्थ और अधिक कैलोरी वाले भोजन का नियमित सेवन स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि, मोटापा सिर्फ किसी एक खाद्य पदार्थ की वजह से नहीं होता। खानपान, शारीरिक गतिविधि, नींद, आनुवंशिक कारणों और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों सहित कई कारक इसमें भूमिका निभाते हैं।
4. डायबिटीज और दूसरी बीमारियों का बढ़ता जोखिम
बढ़ता वजन, कम शारीरिक गतिविधि और असंतुलित खानपान टाइप-2 डायबिटीज के जोखिम को बढ़ा सकते हैं। उम्र, पारिवारिक इतिहास और अन्य स्वास्थ्य कारक भी महत्वपूर्ण हैं।
इसीलिए केवल वजन देखकर किसी व्यक्ति की सेहत का आकलन करना पर्याप्त नहीं है। जरूरत के अनुसार ब्लड शुगर की जांच और नियमित स्वास्थ्य निगरानी भी जरूरी है।
भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने क्या चुनौती है?
लंबे समय तक भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों में बच्चों के कुपोषण, मातृ स्वास्थ्य और भोजन की कमी से जुड़ी समस्याओं पर विशेष ध्यान देना जरूरी रहा है। इन प्रयासों की अहमियत आज भी बनी हुई है।
लेकिन अब इसी के साथ मोटापा, डायबिटीज और हृदय रोग जैसी गैर-संचारी बीमारियों की रोकथाम को भी मजबूत करना होगा।
इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं में दो स्तरों पर काम करना जरूरी है। पहला, गर्भवती महिलाओं, शिशुओं और बच्चों को पर्याप्त एवं संतुलित पोषण उपलब्ध कराना। दूसरा, किशोरों और वयस्कों में स्वस्थ खानपान, नियमित शारीरिक गतिविधि और जरूरत के अनुसार स्वास्थ्य जांच को बढ़ावा देना।
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और क्लीनिकों में पोषण संबंधी सलाह के साथ ब्लड प्रेशर, वजन और ब्लड शुगर की उचित निगरानी पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। इससे परिवार के अलग-अलग सदस्यों की जरूरतों को एक साथ समझने में मदद मिल सकती है।
परिवार अपनी सेहत के लिए क्या कर सकते हैं?
बदलती स्वास्थ्य चुनौतियों के बीच परिवार कुछ व्यावहारिक कदम उठा सकते हैं:
- बच्चों के पोषण पर ध्यान दें: उनकी उम्र के अनुसार लंबाई, वजन और विकास की नियमित निगरानी कराएं।
- संतुलित भोजन को प्राथमिकता दें: दालें, साबुत अनाज, फल, सब्जियां और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थ भोजन में शामिल करें।
- शारीरिक गतिविधि बढ़ाएं: रोजाना चलना, खेलना और उम्र के अनुसार व्यायाम करना फायदेमंद हो सकता है।
- ब्लड शुगर की जांच को नजरअंदाज न करें: डॉक्टर की सलाह और व्यक्तिगत जोखिम के आधार पर जांच कराएं।
- बुजुर्गों और युवाओं की जरूरतें अलग समझें: हर उम्र में पोषण और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतें एक जैसी नहीं होतीं।
इन उपायों का उद्देश्य किसी एक बीमारी पर ध्यान देने के बजाय परिवार के हर सदस्य की जरूरत के मुताबिक स्वास्थ्य की देखभाल करना है।
सेहत में सुधार का मतलब नई चुनौतियों का खत्म होना नहीं
भारत में बच्चों के ठिगनेपन में आई गिरावट एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन वयस्कों में बढ़ता मोटापा और हाई ब्लड शुगर यह बताते हैं कि देश की स्वास्थ्य चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं, बल्कि उनका स्वरूप बदल रहा है।
एक पीढ़ी के लिए पर्याप्त भोजन और कुपोषण से बचाव सबसे बड़ी जरूरत हो सकती है, जबकि अगली पीढ़ी के लिए संतुलित खानपान, सक्रिय जीवनशैली और डायबिटीज की रोकथाम उतनी ही महत्वपूर्ण हो सकती है।
इसलिए भारत की स्वास्थ्य नीति और परिवारों की सोच, दोनों को एक साथ दो सवालों पर ध्यान देना होगा: क्या लोगों को पर्याप्त पोषण मिल रहा है, और क्या वे लंबे समय तक स्वस्थ रहने के लिए जरूरी आदतें अपना पा रहे हैं?
बेहतर स्वास्थ्य का मतलब सिर्फ भूख और कुपोषण से मुक्ति नहीं, बल्कि ऐसी जीवनशैली और स्वास्थ्य व्यवस्था भी है जो लोगों को मोटापा, डायबिटीज और दूसरी गंभीर बीमारियों से बचाने में मदद करे।

