गुलामी की जंजीरें: अंग्रेजों के बनाए वो ‘काले कानून’ जो आजाद भारत में आज भी लागू हैं

Colonial Laws in India. भारत को आजाद हुए सात दशक से अधिक का समय बीत चुका है। हाल ही में भारत सरकार ने 1860 की भारतीय दंड संहिता (IPC) को हटाकर ‘भारतीय न्याय संहिता’ लागू की है, जो औपनिवेशिक कानूनों से मुक्ति की दिशा में एक बड़ा कदम है। लेकिन, भारत की कानूनी किताबों में आज भी कई ऐसे कानून मौजूद हैं, जिन्हें ब्रिटिश हुकूमत ने भारतीयों के कल्याण के लिए नहीं, बल्कि उन्हें दबाने, कुचलने और अपनी सत्ता को सुरक्षित रखने के लिए बनाया था।

इन कानूनों का मुख्य उद्देश्य 1857 जैसी किसी भी क्रांति को दोबारा पनपने से रोकना और स्वतंत्रता सेनानियों की आवाज को खामोश करना था। हैरानी की बात यह है कि आजाद और लोकतांत्रिक भारत में आज भी इन कानूनों का इस्तेमाल हो रहा है। आइए जानते हैं ऐसे ही प्रमुख ब्रिटिशकालीन कानूनों के बारे में।

1. पुलिस अधिनियम, 1861 (The Police Act, 1861)

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी। अंग्रेज समझ गए थे कि भारत पर शासन करने के लिए एक ऐसी पुलिस फोर्स चाहिए जो जनता के प्रति नहीं, बल्कि सत्ता के प्रति वफादार हो।

  • अंग्रेजों का उद्देश्य: इस कानून के तहत एक ऐसी पुलिस व्यवस्था बनाई गई जिसका ढांचा पूरी तरह से सैन्य (Militarized) था। इसका काम अपराध रोकना कम और विद्रोहियों को कुचलना, खौफ पैदा करना और ब्रिटिश हितों की रक्षा करना ज्यादा था।

  • वर्तमान स्थिति: भारत के कई राज्य आज भी इसी 1861 के कानून या इसके आधार पर बने राज्य कानूनों से अपनी पुलिस चला रहे हैं। यही कारण है कि आज भी पुलिस व्यवस्था में जनता के प्रति सेवा भाव से ज्यादा ‘सत्ता का रौब’ और ‘वीआईपी कल्चर’ हावी दिखता है।

2. ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 (Official Secrets Act, 1923)

मूल रूप से यह कानून लॉर्ड कर्जन के समय 1904 में लाया गया था और 1923 में इसे और सख्त कर दिया गया।

  • अंग्रेजों का उद्देश्य: बीसवीं सदी की शुरुआत में राष्ट्रवादी अखबार ब्रिटिश सरकार की गुप्त नीतियों, उनके द्वारा किए जा रहे आर्थिक शोषण और दमन की खबरें छापने लगे थे। अंग्रेजों ने प्रेस की आजादी को कुचलने और सरकारी कामकाज में पूर्ण गोपनीयता बनाए रखने के लिए यह कानून बनाया।

  • वर्तमान स्थिति: आज के सूचना के अधिकार (RTI) के युग में भी यह कानून लागू है। अक्सर इसका इस्तेमाल खोजी पत्रकारों, व्हिसलब्लोअर्स और सरकार की आलोचना करने वालों के खिलाफ किया जाता है, ताकि सरकारी कामकाज की कमियां बाहर न आ सकें।

3. महामारी रोग अधिनियम, 1897 (The Epidemic Diseases Act, 1897)

कोविड-19 महामारी के दौरान आपने इस कानून का नाम बहुत सुना होगा, लेकिन इसका इतिहास बेहद दमनकारी रहा है।

  • अंग्रेजों का उद्देश्य: 1890 के दशक में बॉम्बे (अब मुंबई) में ब्यूबोनिक प्लेग फैला था। अंग्रेजों ने बीमारी रोकने के नाम पर यह कानून बनाया, जिसने अधिकारियों को असीमित शक्तियां दे दीं। ब्रिटिश सैनिक घरों में जबरन घुसते थे, महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार होता था और लोगों को जबरन अलग-थलग कर दिया जाता था। जब बाल गंगाधर तिलक ने अपने अखबार ‘केसरी’ में इस क्रूरता का विरोध किया, तो उन्हें जेल में डाल दिया गया।

  • वर्तमान स्थिति: यह 127 साल पुराना कानून आज भी भारत का मुख्य महामारी नियंत्रण कानून है। यह कानून राज्य को असीमित शक्तियां तो देता है, लेकिन नागरिकों के अधिकारों और स्वास्थ्य सुविधाओं की गारंटी पर मौन रहता है।

4. भारतीय टेलीग्राफ अधिनियम, 1885 (Indian Telegraph Act, 1885)

संचार क्रांति के इस दौर में भी भारत सरकार संचार माध्यमों को नियंत्रित करने के लिए इसी कानून का सहारा लेती है।

  • अंग्रेजों का उद्देश्य: 19वीं सदी के अंत में जब भारत में संचार के साधन विकसित हो रहे थे, तो अंग्रेज चाहते थे कि स्वतंत्रता सेनानियों के संदेशों पर नजर रखी जाए। इस कानून ने ब्रिटिश सरकार को किसी भी संदेश को रोकने या संचार लाइनों को काटने का विशेषाधिकार दिया।

  • वर्तमान स्थिति: आज के समय में सरकार द्वारा फोन टैपिंग (Phone Tapping) और इंटरनेट शटडाउन (Internet Shutdown) के आदेश इसी कानून (विशेषकर धारा 5(2)) के आधार पर दिए जाते हैं।

5. सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून की नींव (AFSPA’s Colonial Origin, 1942)

हालांकि वर्तमान ‘AFSPA’ 1958 में स्वतंत्र भारत की संसद द्वारा पारित किया गया था, लेकिन इसकी आत्मा पूरी तरह से ब्रिटिश है।

  • अंग्रेजों का उद्देश्य: 1942 में महात्मा गांधी ने ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू किया था। पूरे देश में हो रहे उग्र प्रदर्शनों को दबाने के लिए वायसराय लिनलिथगो ने ‘आर्म्ड फोर्सेज (स्पेशल पावर्स) ऑर्डिनेंस, 1942’ लागू किया था, जिसने सेना को किसी भी भारतीय को गोली मारने की खुली छूट दे दी थी।

  • वर्तमान स्थिति: आज भी भारत के कई अशांत क्षेत्रों (जैसे कश्मीर और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्से) में इसका बदला हुआ रूप लागू है, जिसे मानवाधिकार कार्यकर्ता अक्सर एक दमनकारी कानून बताते हैं।

अंग्रेजों ने भारत पर शासन करने के लिए ‘रूल ऑफ लॉ’ (कानून का शासन) नहीं, बल्कि ‘रूल बाय लॉ’ (कानून के जरिए शासन) की नीति अपनाई थी। यद्यपि हाल के वर्षों में कई पुराने और अप्रासंगिक कानूनों को निरस्त किया गया है, लेकिन जब तक पुलिस, गोपनीयता और नागरिक अधिकारों को नियंत्रित करने वाले इन दमनकारी कानूनों की औपनिवेशिक मानसिकता को पूरी तरह से जड़ से नहीं उखाड़ा जाता, तब तक व्यवस्था का पूर्ण भारतीयकरण अधूरा रहेगा।

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