नए लेबर कोड 2026 : गिग वर्कर्स के लिए ‘सुरक्षा कवच’, बदल जाएगी स्विगी-ज़ोमैटो डिलीवरी पार्टनर्स की दुनिया
नए श्रम कानून में गिग वर्कर्स की बल्ले बल्ले।
NEW LABOUR CODE . भारत में तेजी से बढ़ते ‘गिग इकोनॉमी’ (Gig Economy) सेक्टर के लिए वर्ष 2026 एक ऐतिहासिक मोड़ साबित होने वाला है। नए लेबर कोड (Labour Codes) के प्रभावी होने से देश के करोड़ों गिग वर्कर्स जैसे स्विगी, ज़ोमैटो के डिलीवरी पार्टनर और ओला-उबर के ड्राइवर को पहली बार कानूनी पहचान और सामाजिक सुरक्षा का लाभ मिलने जा रहा है।
गिग वर्कर्स को मिलने वाले प्रमुख लाभ
नए कानूनों के तहत सरकार ने गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स के हितों को सुरक्षित करने के लिए इस तरह के प्रावधान किए हैं।
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सामाजिक सुरक्षा कोष (Social Security Fund): नए नियमों के तहत एक विशेष फंड बनाया जाएगा। इसमें एग्रीगेटर कंपनियां (जैसे जोमैटो, अमेज़न आदि) अपने सालाना टर्नओवर का 1% से 2% हिस्सा योगदान करेंगी। इस पैसे का उपयोग वर्कर्स के स्वास्थ्य बीमा, मातृत्व लाभ और वृद्धावस्था सुरक्षा के लिए किया जाएगा।
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डिजिटल पंजीकरण और पहचान: सभी गिग वर्कर्स को ई-श्रम (e-Shram) पोर्टल पर पंजीकरण कराना होगा। इसके बाद उन्हें एक विशिष्ट पहचान मिलेगी, जिससे वे सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का सीधा लाभ उठा सकेंगे।
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बीमा और दुर्घटना कवरेज: अब दुर्घटना की स्थिति में इन वर्कर्स को मुआवजा और चिकित्सा सहायता मिलना आसान होगा। पहले इन्हें ‘स्वतंत्र ठेकेदार’ मानकर कंपनियां अपनी जिम्मेदारी से बच जाती थीं, लेकिन अब कानून इन्हें सुरक्षा के दायरे में लाता है।
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काम के घंटों और भुगतान में पारदर्शिता: नए कोड में काम के घंटों को विनियमित करने और समय पर भुगतान सुनिश्चित करने के निर्देश हैं। साथ ही, शिकायतों के निवारण के लिए एक प्रभावी तंत्र बनाने की बात कही गई है।
जरूरी था बदलाव
भारत में लगभग 1.5 करोड़ से अधिक लोग गिग वर्क से जुड़े हैं। अब तक इनके पास न तो पेंशन की सुविधा थी और न ही कोई निश्चित बीमा। नए लेबर कोड के माध्यम से सरकार इन्हें ‘असंगठित क्षेत्र’ से निकालकर एक व्यवस्थित कानूनी ढांचे में ला रही है।
2026 में लागू होने वाले ये नियम न केवल गिग वर्कर्स के जीवन स्तर को सुधारेंगे, बल्कि कंपनियों को भी अपने कर्मचारियों के प्रति अधिक जवाबदेह बनाएंगे। यह कदम भारत को एक ‘समावेशी अर्थव्यवस्था’ बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
