बूढ़ा होता भारत: जब अपनों के होते हुए भी अकेले रह जाएंगे बुज़ुर्ग
INDIA AGEING POPULATION. बिहार के किसी छोटे शहर में रहने वाली 70 साल की एक महिला की दिनचर्या पर गौर कीजिए। वह अपने घर में अकेली रहती हैं, खुद खाना बनाती हैं और अपनी दवाइयों का ध्यान भी खुद रखती हैं। उनके बच्चे बेंगलुरु या दुबई जैसे शहरों में नौकरी करते हैं। परिवार के बीच प्यार और संपर्क बना हुआ है, लेकिन रोजमर्रा की जरूरतों के लिए बच्चे हर समय उनके पास मौजूद नहीं हो सकते। यह किसी एक परिवार की कहानी नहीं है। भारत में बदलती जीवनशैली, रोजगार के लिए पलायन और छोटे होते परिवारों के बीच बुज़ुर्गों की देखभाल एक बड़ी सामाजिक और आर्थिक चुनौती बनती जा रही है।
भारत में तेजी से बढ़ेगी बुज़ुर्गों की आबादी
भारत को लंबे समय तक दुनिया के युवा देशों में गिना जाता रहा है। बड़ी युवा आबादी को देश की आर्थिक ताकत और विकास के अवसरों से जोड़कर देखा गया। लेकिन आने वाले दशकों में भारत की जनसंख्या का स्वरूप बदलने वाला है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) के अनुमानों के मुताबिक, 2050 तक भारत की कुल आबादी में 60 साल या उससे अधिक उम्र के लोगों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत से ज्यादा हो सकती है। यानी देश में बुज़ुर्गों की संख्या और उनकी जरूरतें, दोनों बड़े पैमाने पर बढ़ेंगी।
एक और महत्वपूर्ण बदलाव सामने आ रहा है। अनुमानों के अनुसार, 2046 तक भारत में 60 साल या उससे अधिक उम्र के लोगों की संख्या 15 साल से कम उम्र के बच्चों से ज्यादा हो सकती है। इस बदलाव का मतलब सिर्फ इतना नहीं है कि देश में बुज़ुर्ग ज्यादा होंगे। इसका असर रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं, सरकारी खर्च, पेंशन और परिवारों की आर्थिक योजना पर भी पड़ेगा।
बुढ़ापे में आर्थिक सुरक्षा सबसे बड़ी चिंता
बुढ़ापे में नियमित आय का होना बेहद जरूरी है। उम्र बढ़ने के साथ काम करने की क्षमता कम हो सकती है और इलाज, दवाइयों तथा रोजमर्रा की जरूरतों पर खर्च बढ़ सकता है। ऐसे में पेंशन, बचत या परिवार से मिलने वाली आर्थिक मदद बुज़ुर्गों के लिए सहारा बनती है।लेकिन भारत में सभी बुज़ुर्गों के पास यह सुरक्षा उपलब्ध नहीं है।
UNFPA की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 40 प्रतिशत से अधिक बुज़ुर्ग सबसे गरीब आर्थिक वर्ग में आते हैं। वहीं, करीब 18.7 प्रतिशत बुज़ुर्गों के पास आय का कोई नियमित स्रोत नहीं है। यह स्थिति उन लोगों के लिए खास तौर पर मुश्किल हो सकती है, जिन्होंने जीवनभर असंगठित क्षेत्र में काम किया हो और जिनके पास रिटायरमेंट के बाद नियमित पेंशन या पर्याप्त बचत न हो। ऐसे में बुढ़ापा केवल उम्र से जुड़ा बदलाव नहीं रह जाता, बल्कि आर्थिक असुरक्षा का कारण भी बन सकता है।
परिवारों का बदलता स्वरूप बढ़ा रहा चुनौती
भारत में परंपरागत रूप से बुज़ुर्गों की देखभाल की जिम्मेदारी परिवार उठाता रहा है। संयुक्त परिवारों में कई पीढ़ियां एक साथ रहती थीं, जिससे रोजमर्रा की जरूरतों में मदद मिलना अपेक्षाकृत आसान था।
लेकिन अब परिस्थितियां बदल रही हैं। परिवार छोटे हो रहे हैं। नौकरी और बेहतर अवसरों की तलाश में बच्चे दूसरे शहरों या विदेशों में बस रहे हैं। वहीं, महंगाई और रहने के बढ़ते खर्च के कारण एक ही समय में अपने परिवार और बुज़ुर्ग माता-पिता की आर्थिक जरूरतें पूरी करना कई लोगों के लिए कठिन हो सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि बच्चों की जिम्मेदारी या माता-पिता के प्रति उनका लगाव कम हो गया है। कई बार समस्या दूरी, समय और संसाधनों की होती है। फोन पर बातचीत और पैसे भेजना जरूरी सहारा हैं, लेकिन हर स्थिति में ये व्यक्तिगत देखभाल, अस्पताल ले जाने या आपातकाल में पास मौजूद रहने का विकल्प नहीं बन सकते।
भारत की पेंशन और स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ेगा दबाव
भारत के सामने चुनौती इसलिए भी बड़ी है, क्योंकि देश को अपनी बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी के लिए पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था तैयार करनी है। कई विकसित देशों ने आर्थिक समृद्धि के लंबे दौर में पेंशन योजनाओं, स्वास्थ्य सेवाओं और बुज़ुर्गों की देखभाल के लिए संस्थागत व्यवस्थाएं विकसित कीं। भारत को भी इसी तरह की जरूरतों का सामना करना है, लेकिन यहां बड़ी आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए सीमित संसाधनों और असंगठित रोजगार की वास्तविकताओं को ध्यान में रखना होगा।
बुज़ुर्गों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का मतलब केवल अस्पताल और डॉक्टर उपलब्ध कराना नहीं है। उन्हें नियमित जांच, लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों का इलाज, सस्ती दवाइयां, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और जरूरत पड़ने पर घर पर देखभाल जैसी सुविधाओं की भी आवश्यकता हो सकती है। इसी तरह, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा का दायरा उन लोगों तक पहुंचाना भी जरूरी है, जिनके पास औपचारिक नौकरी या रिटायरमेंट के बाद नियमित आय की व्यवस्था नहीं है।
रिटायरमेंट की योजना अब सिर्फ एक व्यक्ति का फैसला नहीं
अक्सर रिटायरमेंट प्लानिंग को बचत, फिक्स्ड डिपॉजिट, म्यूचुअल फंड या पेंशन योजना तक सीमित रखा जाता है। लेकिन बदलते सामाजिक हालात में बुढ़ापे की तैयारी इससे कहीं ज्यादा व्यापक होनी चाहिए। हर परिवार को यह भी सोचना होगा कि उम्र बढ़ने पर रहने की व्यवस्था कैसी होगी, इलाज का खर्च कैसे पूरा होगा और जरूरत पड़ने पर मदद के लिए कौन उपलब्ध होगा।
जो लोग आज 30 या 40 साल के हैं, उनके लिए यह सवाल अभी से महत्वपूर्ण है। बुढ़ापे की आर्थिक तैयारी जितनी जल्दी शुरू होगी, भविष्य में अचानक आने वाले खर्चों का सामना करना उतना ही आसान हो सकता है। इसके साथ ही परिवारों को बुज़ुर्ग सदस्यों के साथ उनकी जरूरतों, आर्थिक स्थिति और भविष्य की देखभाल को लेकर खुलकर बातचीत करनी चाहिए।
सरकार और समाज को अभी क्या करना चाहिए?
भारत की बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी के लिए तैयारी केवल परिवारों की जिम्मेदारी नहीं हो सकती। सरकार, नियोक्ताओं और समाज को भी इसमें अपनी भूमिका निभानी होगी।
इसके लिए कुछ कदम खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं:
- पेंशन का दायरा बढ़ाना: असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों को भी वृद्धावस्था में नियमित आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने पर ध्यान देना होगा।
- सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं: बुज़ुर्गों के लिए इलाज, दवाइयों और नियमित स्वास्थ्य जांच की सुविधाएं मजबूत करनी होंगी।
- घर पर देखभाल की व्यवस्था: अकेले रहने वाले बुज़ुर्गों के लिए घरेलू सहायता, स्थानीय देखभाल सेवाओं और आपातकालीन मदद की उपलब्धता बढ़ानी होगी।
- परिवारों को सहयोग: देखभाल करने वाले परिवार के सदस्यों के लिए ऐसी व्यवस्थाएं जरूरी हैं, जिससे नौकरी और बुज़ुर्गों की जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाया जा सके।
- वित्तीय जागरूकता: लोगों को कामकाजी उम्र से ही बचत, पेंशन और स्वास्थ्य खर्च की योजना बनाने के लिए प्रोत्साहित करना होगा।
बुज़ुर्गों के भविष्य की तैयारी आज से जरूरी
भारत की बढ़ती बुज़ुर्ग आबादी अपने आप में संकट नहीं है। लंबी उम्र तक जीना बेहतर स्वास्थ्य और जीवन की प्रगति का संकेत भी हो सकता है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि लोगों को उम्र बढ़ने के साथ आर्थिक असुरक्षा, इलाज की कमी या अकेलेपन का सामना न करना पड़े।
भारत ने दशकों तक अपनी युवा आबादी और कामकाजी लोगों की जरूरतों पर ध्यान दिया है। अब समय है कि विकास की योजनाओं में बुज़ुर्गों की जरूरतों को भी उतनी ही गंभीरता से शामिल किया जाए।
इस बदलाव की शुरुआत हर परिवार अपने घर से कर सकता है। परिवार में 60 साल से अधिक उम्र के लोगों की आर्थिक स्थिति, स्वास्थ्य सुविधाओं और रोजमर्रा की जरूरतों पर बात करना जरूरी है। क्या उनके पास नियमित आय है? क्या वे जरूरत पड़ने पर इलाज करा सकते हैं? और क्या संकट के समय कोई उनके पास पहुंच सकता है?
इन सवालों के जवाब आज तलाशना, कल की मुश्किलों को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। भारत के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि भविष्य में कितने बुज़ुर्ग होंगे, बल्कि यह भी है कि क्या उन्हें सम्मान, सुरक्षा और बेहतर जीवन देने की तैयारी समय रहते पूरी की जा सकेगी।

