क्या छत्तीसगढ़ में भगवान भी सरकारी फाइलों में कैद हैं? जानिए मंदिरों, मस्जिदों और चर्च पर किसका है कंट्रोल
Government control on temples in Chhattisgarh. दक्षिण भारत के राज्यों की तरह ही अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या छत्तीसगढ़ में भी मंदिरों पर सरकार का सीधा नियंत्रण है? क्या मस्जिदों और गिरजाघरों (चर्च) के लिए भी यही नियम लागू होते हैं? आइए, तथ्यों के आधार पर समझते हैं कि छत्तीसगढ़ में धार्मिक स्थलों के प्रबंधन और नियंत्रण की कानूनी स्थिति क्या है।
छत्तीसगढ़ में कितने मंदिरों पर है सरकारी नियंत्रण?
छत्तीसगढ़ में दक्षिण भारतीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु या केरल) की तरह ‘हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE)’ जैसा कोई अलग से सख्त कानून नहीं है जो सीधे तौर पर हर मंदिर का पूर्ण अधिग्रहण कर ले। हालांकि, प्रदेश के सैकड़ों प्रमुख सार्वजनिक मंदिर सरकारी नियमन (Regulation) के दायरे में आते हैं।
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एक अनुमान के अनुसार, राज्य के लगभग सभी बड़े और ऐतिहासिक मंदिर (जैसे डोंगरगढ़ की मां बम्लेश्वरी, रतनपुर की महामाया, और दंतेवाड़ा की दंतेश्वरी माता) सीधे तौर पर या ट्रस्ट के माध्यम से सरकारी निगरानी में काम करते हैं।
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इसके अलावा, सैकड़ों प्राचीन और पुरातात्विक मंदिर (जैसे भोरमदेव, सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर) सीधे तौर पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) या राज्य संस्कृति और पुरातत्व विभाग के संरक्षण और नियंत्रण में हैं।
क्या मस्जिद और गिरजाघरों पर भी है सरकार का नियंत्रण?
यह एक बड़ा कानूनी और संवैधानिक पेंच है। भारत में अल्पसंख्यक धार्मिक संस्थानों को अलग कानूनी संरक्षण प्राप्त है।
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मस्जिद: मस्जिदों और अन्य इस्लामी संपत्तियों का प्रबंधन सीधे राज्य सरकार नहीं करती है। ये वक्फ अधिनियम (Waqf Act) के तहत ‘राज्य वक्फ बोर्ड’ द्वारा प्रबंधित होते हैं। हालांकि वक्फ बोर्ड एक वैधानिक निकाय है, लेकिन इसका स्वरूप मंदिरों पर लागू होने वाले ट्रस्ट एक्ट से काफी अलग और अधिक स्वायत्त है।
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गिरजाघर (चर्च): चर्च और ईसाई धार्मिक संपत्तियां आमतौर पर डायोसीज़ (Diocese), क्रिश्चियन ट्रस्ट या सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत स्वतंत्र निजी ट्रस्टों द्वारा प्रबंधित की जाती हैं। इन पर सरकार का सीधा नियंत्रण या उनके दान की राशि पर सरकारी हस्तक्षेप लगभग न के बराबर होता है।
किस नियम के तहत होता है मंदिरों का नियंत्रण?
छत्तीसगढ़ में जो मंदिर सार्वजनिक संपत्ति माने जाते हैं या जिन्हें जनता के दान से चलाया जाता है, वे ‘छत्तीसगढ़ सार्वजनिक न्यास अधिनियम, 1951’ (Chhattisgarh Public Trusts Act, 1951) (जो मूल रूप से मध्य प्रदेश का कानून था) के तहत आते हैं।
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निजी vs सार्वजनिक: इंडियन ट्रस्ट एक्ट, 1882 केवल निजी ट्रस्टों पर लागू होता है। लेकिन, जब कोई मंदिर आम जनता के लिए पूरी तरह खुला हो और जनता से दान लेता हो, तो वह ‘पब्लिक ट्रस्ट’ बन जाता है।
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इस कानून के तहत सार्वजनिक मंदिरों को अपना रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होता है, उन्हें अपने वित्तीय रिकॉर्ड (ऑडिट) सरकार को सौंपने होते हैं और कुप्रबंधन की स्थिति में सरकार (कलेक्टर/एसडीएम के माध्यम से) ट्रस्टियों को हटाकर प्रशासक नियुक्त कर सकती है।
देखरेख कौन सा विभाग करता है?
छत्तीसगढ़ में इन धार्मिक ट्रस्टों, मंदिरों के दान, और तीर्थयात्रियों से जुड़ी व्यवस्थाओं की निगरानी ‘धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व विभाग’ (Religious Trusts and Endowments Department) द्वारा की जाती है। जिला स्तर पर कलेक्टर या अनुविभागीय अधिकारी (SDM) आमतौर पर पब्लिक ट्रस्ट के ‘रजिस्ट्रार’ के रूप में कार्य करते हैं, जो इन मंदिरों की कमेटियों पर प्रशासनिक नियंत्रण रखते हैं।
छत्तीसगढ़ में मस्जिदों और चर्चों के मुकाबले, सार्वजनिक हिंदू मंदिर ‘पब्लिक ट्रस्ट एक्ट’ के तहत अधिक सरकारी रेगुलेशन और ऑडिट के दायरे में आते हैं। यही कारण है कि समय-समय पर देश भर की तरह छत्तीसगढ़ में भी “मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने” की मांग उठती रहती है।

