भारत में इथेनॉल का भारी स्टॉक: क्या है सच्चाई, क्यों भरे हैं डिस्टिलरीज के गोदाम और क्या होगा आगे का रास्ता?
Ethanol Stock in India. भारत सरकार ने 2025 तक पेट्रोल में 20% इथेनॉल सम्मिश्रण (E20) का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा था। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए देश भर की डिस्टिलरीज (शराब और इथेनॉल बनाने वाले कारखाने) ने अपनी उत्पादन क्षमता में भारी इजाफा किया। लेकिन, हालिया महीनों में एक नई समस्या उभर कर सामने आई है— देश की डिस्टिलरीज में इथेनॉल का भारी स्टॉक जमा हो गया है।
क्या वास्तविकता में इथेनॉल का स्टॉक खड़ा हो गया है?
हां, यह बिल्कुल सही है। देश के कई राज्यों (विशेषकर महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक) में स्थित डिस्टिलरीज के पास इथेनॉल का भारी भंडार जमा हो गया है। कारखानों ने तेल विपणन कंपनियों (OMCs – जैसे इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम) के टेंडर और मांग के आधार पर उत्पादन तो कर लिया, लेकिन OMCs द्वारा इस इथेनॉल का उठाव (Lifting) बहुत धीमी गति से हो रहा है। नतीजतन, डिस्टिलरीज के स्टोरेज टैंक फुल हो चुके हैं और उत्पादन रोकना या धीमा करना पड़ रहा है।
ऐसा क्यों हुआ?
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OMCs के पास स्टोरेज क्षमता की कमी: तेल कंपनियों (OMCs) ने इथेनॉल खरीदने के टेंडर तो जारी कर दिए, लेकिन उनके डिपो में इथेनॉल को स्टोर करने की पर्याप्त जगह (Storage Infrastructure) नहीं है। डिपो फुल होने के कारण वे डिस्टिलरीज से इथेनॉल नहीं उठा पा रहे हैं।
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सरकारी नीतियों में अचानक बदलाव: 2023 के अंत में चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने गन्ने के रस और बी-हैवी मोलासेस से इथेनॉल बनाने पर रोक लगा दी थी। इसके बाद डिस्टिलरीज ने मक्का और टूटे चावल (अनाज आधारित) की ओर रुख किया। हाल ही में सरकार ने गन्ने के रस से इथेनॉल बनाने की पाबंदी हटा ली है। नीतियों के इस उतार-चढ़ाव से उत्पादन और सप्लाई चेन का तालमेल बिगड़ गया।
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लॉजिस्टिक और परिवहन की समस्या: कई बार डिस्टिलरीज से OMCs के डिपो तक इथेनॉल पहुंचाने के लिए आवश्यक टैंकरों की कमी या परिवहन में देरी भी स्टॉक जमा होने का एक बड़ा कारण बनती है।
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अनाज आधारित इथेनॉल का सरप्लस: सरकार के प्रोत्साहन के बाद मक्का और चावल आधारित इथेनॉल का उत्पादन तेजी से बढ़ा, लेकिन OMCs इसके इतने बड़े वॉल्यूम को एक साथ खपाने के लिए पूरी तरह तैयार नहीं थीं।
इसका क्या असर हो रहा है?
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डिस्टिलरीज पर आर्थिक संकट: इथेनॉल न बिकने के कारण डिस्टिलरीज का वर्किंग कैपिटल (कार्यशील पूंजी) फंस गया है। उन्हें बैंकों का कर्ज चुकाने और अपनी रोजमर्रा की लागत निकालने में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।
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किसानों के भुगतान में देरी: जब डिस्टिलरीज का पैसा ब्लॉक हो जाता है, तो इसका सीधा असर गन्ना और मक्का किसानों पर पड़ता है। मिलें किसानों को समय पर उनके उत्पाद का भुगतान नहीं कर पाती हैं, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है।
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E20 लक्ष्य पर खतरा: यदि उत्पादन क्षमता होने के बावजूद डिस्टिलरीज को स्टोरेज फुल होने के कारण अपने प्लांट बंद करने पड़े, तो भविष्य में आपूर्ति बाधित हो सकती है। इससे 20% इथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) का राष्ट्रीय लक्ष्य प्रभावित हो सकता है।
अब आगे क्या रास्ते हैं?
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OMCs के स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार: सबसे पहला और जरूरी कदम यह है कि तेल कंपनियां अपने डिपो में इथेनॉल भंडारण की क्षमता को तेजी से बढ़ाएं ताकि वे डिस्टिलरीज से समय पर सप्लाई ले सकें।
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स्थिर और दीर्घकालिक नीति: सरकार को चाहिए कि कच्चे माल (गन्ना, मक्का, चावल) के उपयोग पर बार-बार प्रतिबंध लगाने या हटाने की बजाय एक स्थिर दीर्घकालिक नीति बनाए। इससे उद्योग को भविष्य की योजना बनाने में मदद मिलेगी।
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फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा: देश में फ्लेक्स-फ्यूल (Flex-Fuel) वाहनों (जो 20% से 85% इथेनॉल मिश्रित ईंधन पर चल सकें) के निर्माण और बिक्री को तेजी से बढ़ावा देना होगा, ताकि इथेनॉल की खपत का दायरा सिर्फ पेट्रोल ब्लेंडिंग तक सीमित न रहे।
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राज्यों के बीच समन्वय: इथेनॉल का उत्पादन मुख्य रूप से कुछ ही राज्यों (यूपी, महाराष्ट्र, कर्नाटक) में केंद्रित है, जबकि खपत पूरे देश में है। रेलवे और पाइपलाइन के माध्यम से इथेनॉल के परिवहन (Logistics) को सस्ता और सुलभ बनाने की आवश्यकता है।
इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम भारत के लिए विदेशी मुद्रा बचाने और पर्यावरण सुधारने का एक बड़ा हथियार है। लेकिन उत्पादन और खपत के बीच जो ढांचागत खाई (Infrastructure Gap) बन गई है, उसे तुरंत पाटना आवश्यक है।
इन बातों से उजागर हुई समस्या
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उद्योग संघों की हालिया चिंताएं (Industry Reports): पिछले कुछ समय से इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (ISMA) और ग्रेन (अनाज) आधारित डिस्टिलरी संघ लगातार यह मुद्दा उठा रहे हैं कि OMCs (इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम, हिंदुस्तान पेट्रोलियम) टेंडर जारी करने के बावजूद इथेनॉल का उठाव (Lifting) बहुत धीमी गति से कर रही हैं, जिससे उनके स्टोरेज टैंक फुल हो गए हैं।
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OMCs के स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी: यह पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय और उद्योग की बैठकों में सामने आया एक ज्ञात तथ्य है कि जिस गति से भारत में इथेनॉल उत्पादन की क्षमता (विशेषकर मक्का और टूटे चावल से) तेजी से बढ़ी है, उस गति से OMCs के डिपो में इथेनॉल को स्टोर करने की क्षमता का विस्तार नहीं हो पाया है।
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सरकारी नीतियों में उतार-चढ़ाव: दिसंबर 2023 में खाद्य सुरक्षा और चीनी के दाम नियंत्रित करने के लिए सरकार ने गन्ने के रस से इथेनॉल बनाने पर रोक लगाई थी और डिस्टिलरीज को मक्के की ओर शिफ्ट होने को कहा था। हाल ही में इस रोक को फिर से हटा लिया गया है। नीतियों के इस शिफ्ट के कारण सप्लाई चेन का संतुलन बिगड़ा और बाजार में असमंजस की स्थिति बनी।
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आर्थिक प्रभाव का सीधा गणित: जब किसी डिस्टिलरी में उत्पादन लगातार हो रहा हो और खरीदार (OMCs) उसे समय पर न उठाए, तो स्वाभाविक रूप से कंपनियों की वर्किंग कैपिटल (पूंजी) ब्लॉक हो जाती है। इसका सीधा असर कच्चे माल के आपूर्तिकर्ताओं यानी किसानों (गन्ना और मक्का उत्पादकों) के भुगतान पर पड़ता है।

