दूध-दही और लस्सी पैकेट में महीनों क्यों नहीं होते खराब? जानिए सेहत के लिए ‘खुला’ सुरक्षित है या ‘पैक्ड’

Loose vs Packaged Dairy. डेयरी उत्पाद (दूध, दही, छाछ) नमी, प्रोटीन और फैट से भरपूर होते हैं, जो बैक्टीरिया और फंगस के पनपने के लिए सबसे अनुकूल वातावरण है। खुले वातावरण में हवा के संपर्क में आते ही इनमें मौजूद प्राकृतिक माइक्रोब्स तेजी से मल्टीप्लाई होने लगते हैं, जिससे कुछ ही घंटों में खट्टापन और दुर्गंध (Spoilage) आने लगती है। इसके विपरीत, पैक्ड डेयरी उत्पादों की लंबी शेल्फ लाइफ का कारण केवल केमिकल प्रिजर्वेटिव्स नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे आधुनिक फूड प्रोसेसिंग तकनीक और खास तरह की पैकेजिंग का विज्ञान है।

पैक्ड डेयरी उत्पादों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए मुख्य रूप से तीन स्तरों पर काम किया जाता है:

  • थर्मल प्रोसेसिंग (Pasteurization और UHT): साधारण पैकेट वाले दूध (जो 1-2 दिन चलते हैं) को पाश्चराइज किया जाता है (लगभग 72°C पर 15 सेकंड के लिए गर्म करके तुरंत ठंडा करना)। वहीं, महीनों तक चलने वाले टेट्रा पैक दूध या शेक को UHT (Ultra-High Temperature) तकनीक से गुजारा जाता है। इसमें उत्पाद को 135°C से 150°C पर 2 से 5 सेकंड के लिए गर्म किया जाता है, जिससे सभी तरह के बैक्टीरिया और उनके बीजाणु (Spores) पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं।

  • असेप्टिक पैकेजिंग (Aseptic Packaging): UHT ट्रीटमेंट के बाद दूध, लस्सी या शेक को पूरी तरह से कीटाणुरहित (Sterilized) वातावरण में टेट्रा पैक या खास बोतलों में पैक किया जाता है। इस पैकेजिंग में एल्युमिनियम और प्लास्टिक की कई परतें होती हैं, जो उत्पाद को हवा, रोशनी और बाहरी नमी से पूरी तरह काट देती हैं।

  • स्टेबलाइजर्स और प्रिजर्वेटिव्स: दही, लस्सी, शेक और श्रीखंड जैसी चीजों का टेक्सचर बनाए रखने और फंगस से बचाने के लिए कुछ खास फूड एडिटिव्स का इस्तेमाल होता है।

पैक्ड डेयरी उत्पादों में मिलाए जाने वाले प्रमुख तत्व

डेयरी उत्पादों की शेल्फ लाइफ और बनावट को सुधारने के लिए FSSAI (फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) द्वारा निर्धारित मात्रा में कुछ तत्व मिलाए जाते हैं:

  • प्रिजर्वेटिव्स (Preservatives): श्रीखंड, फ्लेवर्ड दही और कुछ तरह के पनीर में फंगस (Mold/Yeast) को रोकने के लिए ‘नैटामइसिन’ (Natamycin – E235), ‘पोटेशियम सॉर्बेट’ (Potassium Sorbate – E202) और ‘निसिन’ (Nisin – E234) का इस्तेमाल होता है। ये तत्व बैक्टीरिया और फंगस की सेलवॉल को तोड़ देते हैं।

  • स्टेबलाइजर्स और थिकनर्स (Stabilizers/Thickeners): मिल्कशेक और छाछ में पानी और फैट को अलग होने से रोकने के लिए कैरेजेनन (Carrageenan), पेक्टिन (Pectin) और ग्वार गम (Guar Gum) मिलाए जाते हैं। इससे उत्पाद महीनों तक एक समान गाढ़ा रहता है।

  • एसिडिटी रेगुलेटर्स: उत्पाद के खट्टेपन को संतुलित करने के लिए लैक्टिक एसिड या साइट्रिक एसिड का उपयोग किया जाता है।

सेहत पर इन तत्वों और प्रोसेसिंग का प्रभाव

पैक्ड उत्पादों में इस्तेमाल होने वाले प्रिजर्वेटिव्स और स्टेबलाइजर्स ‘GRAS’ (Generally Recognized As Safe) श्रेणी में आते हैं। निर्धारित मात्रा में इनका सेवन सुरक्षित माना जाता है, लेकिन कुछ प्रभाव ध्यान देने योग्य हैं:

  • पोषक तत्वों में कमी: UHT तकनीक से दूध को अत्यधिक तापमान पर गर्म करने से विटामिन बी कॉम्प्लेक्स (विशेषकर B12 और विटामिन C) जैसे हीट-सेंसिटिव विटामिन्स में आंशिक कमी आ जाती है। हालांकि, प्रोटीन और कैल्शियम की मात्रा पर कोई खास असर नहीं पड़ता।

  • आंतों के स्वास्थ्य (Gut Health) पर असर: कुछ रिसर्च बताती हैं कि लंबे समय तक अधिक मात्रा में स्टेबलाइजर्स (जैसे कैरेजेनन) और कृत्रिम प्रिजर्वेटिव्स का सेवन करने से गट माइक्रोबायोम (आंतों के गुड बैक्टीरिया) का संतुलन बिगड़ सकता है, जिससे कुछ लोगों को पाचन या सूजन (Inflammation) की समस्या हो सकती है।

  • छिपी हुई चीनी (Hidden Sugar): पैक्ड लस्सी, मिल्कशेक और श्रीखंड को प्रिजर्व करने और स्वाद बढ़ाने के लिए भारी मात्रा में रिफाइंड शुगर और आर्टिफिशियल फ्लेवर मिलाए जाते हैं। नियमित सेवन से यह मोटापे और मेटाबॉलिक सिंड्रोम का कारण बन सकता है।

खुला बनाम पैक्ड: सेहत के लिए क्या है ज्यादा बेहतर?

खुले डेयरी उत्पादों का सबसे बड़ा फायदा उनका ताजा होना और प्रोसेसिंग से मुक्त होना है। अगर आपके सामने गाय/भैंस का दूध निकाला जा रहा है और पूरी साफ-सफाई रखी गई है, तो उससे बेहतर कुछ नहीं। लेकिन भारत में खुले दूध के साथ सबसे बड़ी समस्या मिलावट (यूरिया, डिटर्जेंट, सिंथेटिक दूध) और हाइजीन की कमी है। अनपाश्चराइज्ड (कच्चे) खुले दूध में साल्मोनेला (Salmonella) और ई. कोलाई (E. coli) जैसे खतरनाक बैक्टीरिया होने का भारी जोखिम होता है।

दूसरी ओर, पैक्ड और पाश्चराइज्ड डेयरी उत्पाद (जैसे रोजमर्रा मिलने वाली दूध की थैलियां) फूड सेफ्टी के लिहाज से ज्यादा सुरक्षित हैं। इनमें मिलावट की गुंजाइश न के बराबर होती है और पैथोजेन्स (बीमारी फैलाने वाले कीटाणु) नष्ट हो चुके होते हैं। कई बार पैक्ड दूध में विटामिन ए और डी अलग से मिलाए (Fortified) जाते हैं, जो इसे पोषण के लिहाज से बेहतर बनाते हैं।

अगर तुलना रोजमर्रा के इस्तेमाल की हो, तो 1-2 दिन की शेल्फ लाइफ वाला पाश्चराइज्ड पैकेट का दूध (Pouch Milk) या ताजा जमाया हुआ दही सबसे सुरक्षित और संतुलित विकल्प है। इसमें खुले दूध की तरह बीमारियों का खतरा नहीं होता और न ही 6 महीने चलने वाले टेट्रा पैक जितने प्रिजर्वेटिव्स या प्रोसेसिंग होती है। महीनों चलने वाले फ्लेवर्ड मिल्कशेक, पैक्ड लस्सी या श्रीखंड को नियमित आहार का हिस्सा बनाने के बजाय कभी-कभार के सेवन (Occasional treat) तक सीमित रखना ही सेहत के लिए फायदेमंद है।