जेडीयू से निकाले जाने के बाद क्या खत्म होगी अनंत सिंह की विधायकी? समझिए दल-बदल कानून
Anant Singh MLA Disqualification: बिहार की राजनीति में मोकामा से विधायक अनंत सिंह को लेकर बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) ने 24 अक्टूबर 2026 को उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निष्कासित कर दिया और उनकी प्राथमिक सदस्यता भी तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दी। पार्टी ने विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार से संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत उनकी विधायकी समाप्त करने की कार्रवाई करने की अनुशंसा भी की है। जेडीयू का आरोप है कि अनंत सिंह ने पार्टी के निर्देशों की अनदेखी की, वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया और विधान परिषद चुनाव में पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज कुमार के बजाय जन सुराज के प्रत्याशी अनुज सिंह के समर्थन में प्रचार किया।
इस घटनाक्रम के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या किसी राजनीतिक दल से निष्कासित होने के बाद विधायक की विधानसभा सदस्यता भी खत्म हो जाती है? क्या दूसरे दल के उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करना दल-बदल माना जाएगा? और इस पूरे मामले में विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका क्या होगी?इन सवालों के जवाब के लिए संविधान की दसवीं अनुसूची और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को समझना जरूरी है।
क्या है संविधान की दसवीं अनुसूची?
संविधान की दसवीं अनुसूची को दल-बदल विरोधी कानून कहा जाता है। इसे 1985 में 52वें संविधान संशोधन के जरिए संविधान में शामिल किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दल बदलने के कारण सांसदों और विधायकों की सदस्यता पर पड़ने वाले प्रभाव को नियंत्रित करना और राजनीतिक दलों के प्रति निर्वाचित प्रतिनिधियों की जवाबदेही सुनिश्चित करना है। इस कानून के तहत कुछ परिस्थितियों में विधायक या सांसद को सदन की सदस्यता के लिए अयोग्य ठहराया जा सकता है। हालांकि, हर तरह की पार्टी-विरोधी गतिविधि अपने आप दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता का आधार नहीं बनती। इसके लिए यह देखना पड़ता है कि संबंधित व्यक्ति का आचरण संविधान में निर्धारित शर्तों के दायरे में आता है या नहीं।
किन परिस्थितियों में जा सकती है विधायक की सदस्यता?
दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2 में दल-बदल के आधार पर अयोग्यता के प्रमुख प्रावधान दिए गए हैं।
1. स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ना:* पैराग्राफ 2(1)(a) के तहत यदि कोई विधायक स्वेच्छा से उस राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है, जिसके टिकट पर वह निर्वाचित हुआ था, तो उसे अयोग्य ठहराया जा सकता है। इसके लिए केवल औपचारिक इस्तीफा देना ही जरूरी नहीं है। विधायक के आचरण से भी यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उसने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है।
2. पार्टी के निर्देश के खिलाफ मतदान करना:* पैराग्राफ 2(1)(b) के तहत यदि कोई विधायक अपनी पार्टी के निर्देश के विपरीत सदन में मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है और पार्टी 15 दिनों के भीतर उसके इस आचरण को माफ नहीं करती, तो अयोग्यता का आधार बन सकता है।
3. अयोग्यता पर फैसला:* पैराग्राफ 6 के अनुसार, दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता का सवाल संबंधित सदन के अध्यक्ष या सभापति तय करते हैं। बिहार विधानसभा के मामले में यह जिम्मेदारी विधानसभा अध्यक्ष की होगी।
क्या दूसरे दल के उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करना दल-बदल है?
अनंत सिंह के मामले में यही सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल है। जेडीयू का आरोप है कि उन्होंने विधान परिषद चुनाव में पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के बजाय दूसरे दल के प्रत्याशी के पक्ष में प्रचार किया।यहां दो स्थितियों के बीच अंतर समझना जरूरी है। पहली स्थिति तब होती है, जब कोई विधायक विधानसभा या विधान परिषद के चुनाव से संबंधित सदन में अपनी पार्टी के निर्देश के खिलाफ मतदान करता है। दूसरी स्थिति तब होती है, जब वह किसी चुनाव में दूसरे उम्मीदवार के समर्थन में प्रचार करता है।दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2(1)(b) में सदन में मतदान या मतदान से अनुपस्थित रहने से संबंधित प्रावधान है। इसलिए किसी दूसरे उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करने को इसी प्रावधान के तहत सीधे अयोग्यता का आधार नहीं माना जा सकता।
हालांकि, यदि शिकायत में ऐसे तथ्य या आचरण सामने आते हैं, जिनसे यह निष्कर्ष निकलता है कि विधायक ने स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है, तो पैराग्राफ 2(1)(a) के तहत अलग कानूनी सवाल उठ सकता है। इसके लिए संबंधित तथ्यों और सबूतों की जांच आवश्यक होगी। यानी पार्टी के खिलाफ प्रचार करना और संवैधानिक अर्थ में दल-बदल करना एक ही बात नहीं है। अनंत सिंह के मामले में यह देखना होगा कि जेडीयू अपनी अनुशंसा में कौन-से कानूनी आधार और सबूत प्रस्तुत करती है।
पार्टी से निकाले जाने पर क्या विधायक की सदस्यता खत्म हो जाती है?
इस सवाल पर सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण फैसला है—जी. विश्वनाथन बनाम तमिलनाडु विधानसभा अध्यक्ष, 1996।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि किसी राजनीतिक दल से निष्कासित कर दिए जाने के बावजूद, दसवीं अनुसूची के उद्देश्य से संबंधित विधायक को उसी दल का सदस्य माना जा सकता है, जिसके टिकट पर वह चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचा था। केवल पार्टी से निकाले जाने के कारण वह दल-बदल कानून के दायरे से बाहर नहीं हो जाता। इस फैस का मतलब यह नहीं है कि पार्टी से निकाले गए हर विधायक की सदस्यता समाप्त हो जाएगी। इसका अर्थ यह है कि निष्कासन अपने आप में न तो विधायकी खत्म करता है और न ही विधायक को दल-बदल विरोधी कानून से बाहर करता है। अयोग्यता के लिए कानून में निर्धारित आधारों का मौजूद होना जरूरी है।इसीलिए अनंत सिंह के मामले में जेडीयू का निष्कासन आदेश और उनकी विधानसभा सदस्यता पर फैसला दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
रवि एस. नाइक केस में सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?
1994 के रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि राजनीतिक दल की सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ने का अर्थ केवल औपचारिक रूप से इस्तीफा देना नहीं है। किसी जनप्रतिनिधि के व्यवहार और गतिविधियों से भी यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उसने स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है।हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पार्टी के खिलाफ किया गया हर बयान या राजनीतिक असहमति अपने आप अयोग्यता साबित कर देती है। मामले के तथ्यों, उपलब्ध सामग्री और संवैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखकर ही निर्णय लिया जा सकता है।अनंत सिंह के मामले में भी यह महत्वपूर्ण होगा कि शिकायत में केवल पार्टी-विरोधी गतिविधियों का आरोप है या ऐसे तथ्य भी दिए गए हैं, जो दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता के आधार से संबंधित हैं।
अनंत सिंह की विधायकी पर फैसला कौन करेगा?
संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 6 के तहत अयोग्यता के सवाल पर फैसला संबंधित सदन के अध्यक्ष या सभापति करते हैं। इसलिए अनंत सिंह की विधानसभा सदस्यता के मामले में बिहार विधानसभा अध्यक्ष प्रेम कुमार की भूमिका महत्वपूर्ण होगी।जेडीयू की अनुशंसा के बाद संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत शिकायत और उसके समर्थन में पेश किए गए तथ्यों पर विचार किया जा सकता है। अनंत सिंह को अपना पक्ष रखने का अवसर दिए जाने और लागू नियमों के अनुसार मामले की जांच के बाद निर्णय लिया जाएगा।
यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि विधानसभा अध्यक्ष का फैसला पूरी तरह न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने किहोटो होलोहान बनाम जाचिल्हू (1992) मामले में स्पष्ट किया था कि दसवीं अनुसूची के तहत अध्यक्ष के फैसले की न्यायिक समीक्षा संभव है, हालांकि यह निर्धारित कानूनी सीमाओं के अधीन होती है।इसलिए जेडीयू की अनुशंसा को अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता। अनंत सिंह की सदस्यता पर फैसला संबंधित संवैधानिक प्रक्रिया और लागू कानून के आधार पर ही होगा।
अनंत सिंह की विधायकी पर अभी क्या कहा जा सकता है?
अनंत सिंह को जेडीयू से छह साल के लिए निष्कासित कर दिया गया है और पार्टी ने उनकी विधायकी समाप्त करने की अनुशंसा की है। लेकिन केवल पार्टी से निष्कासन के आधार पर उनकी विधानसभा सदस्यता अपने आप खत्म नहीं होती। दूसरे उम्मीदवार के पक्ष में प्रचार करने का आरोप भी अपने आप दल-बदल के तहत अयोग्यता साबित नहीं करता। असली सवाल यह होगा कि क्या शिकायत में दिए गए तथ्य संविधान की दसवीं अनुसूची के किसी प्रावधान के तहत अयोग्यता का आधार बनते हैं। अब आगे की प्रक्रिया में जेडीयू की अनुशंसा, प्रस्तुत सबूत, अनंत सिंह का पक्ष और विधानसभा अध्यक्ष का निर्णय अहम होंगे। इन्हीं के आधार पर स्पष्ट होगा कि मोकामा के विधायक की सदस्यता पर कोई असर पड़ता है या वह विधायक बने रहते हैं।

