खेल बजट हुआ दोगुना, सुविधाओं की बारिश, फिर भी ओलंपिक में पदकों का सूखा क्यों? जानें 10 साल में क्या बदला
Sports Budget and Medals in India. भारत में पिछले एक दशक में खेलों की तस्वीर तेजी से बदली है। सुविधाओं और बजट के मोर्चे पर सरकार ने खजाना खोल दिया है, लेकिन पदकों की संख्या को लेकर अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या करोड़ों के निवेश का सही रिटर्न मिल रहा है? यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य को समझना जरूरी है—एशियाई खेलों में भारत ने जबरदस्त छलांग लगाई है (2014 के 57 पदकों से बढ़कर 2023 हांगझोउ में ऐतिहासिक 107 पदक), लेकिन ओलंपिक के मंच पर (टोक्यो में 7 और पेरिस 2024 में 6 पदक) हम अभी भी सिंगल डिजिट में अटके हुए हैं।
आइए पिछले 10 सालों के खेल बजट, सरकारी योजनाओं और पदक विजेताओं को मिलने वाली सुविधाओं का विस्तृत विश्लेषण करते हैं।
10 साल में कितना बढ़ा खेल बजट?
खेल मंत्रालय के बजट में पिछले 10 वर्षों में ऐतिहासिक उछाल आया है।
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2014-15 का बजट: लगभग ₹1,200 से ₹1,600 करोड़ के बीच हुआ करता था।
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2023-24 और 2024-25 का बजट: अब यह बढ़कर लगभग ₹3,400 करोड़ (₹3397.32 करोड़) हो गया है। यह 10 साल पहले की तुलना में दोगुने से भी अधिक है।
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खेलो इंडिया पर जोर: वर्तमान बजट में सिर्फ ‘खेलो इंडिया’ योजना के लिए ही ₹900 करोड़ से अधिक का प्रावधान किया गया है, जो ग्रासरूट टैलेंट को निखारने पर केंद्रित है।
10 सालों में खेलों को बढ़ावा देने वाली प्रमुख योजनाएं
सरकार ने पिछले एक दशक में खेल के ईको-सिस्टम को बदलने के लिए कई अहम कदम उठाए हैं:
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खेलो इंडिया योजना (2016-17 में शुरू): इस योजना ने जमीनी स्तर पर प्रतिभाओं को खोजने का काम किया है। देशभर में 1,000 से अधिक ‘खेलो इंडिया सेंटर्स’ खोले गए हैं। चुने गए एथलीटों को 8 साल तक सालाना ₹5 लाख की स्कॉलरशिप दी जाती है, जिसमें ₹10,000 प्रति माह का आउट-ऑफ-पॉकेट अलाउंस (जेब खर्च) शामिल है।
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टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम – TOPS (2014 में लॉन्च): यह एलीट और संभावित पदक विजेता खिलाड़ियों के लिए है। इसके तहत खिलाड़ियों को विदेश में ट्रेनिंग, विदेशी कोच, विश्व स्तरीय स्पोर्ट्स इक्विपमेंट और स्पोर्ट्स साइंस (फिजियो, न्यूट्रिशनिस्ट) का पूरा खर्च सरकार उठाती है।
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नेशनल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट फंड (NSDF) और आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर: साई (SAI) ट्रेनिंग सेंटर्स को अपग्रेड किया गया है। 323 नए स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी दी गई है जिन पर ₹3,073 करोड़ से ज्यादा खर्च हो रहे हैं।
खिलाड़ियों के लिए पैसा और सुविधाएं: पहले और अब
एक दशक पहले तक खिलाड़ियों को सुविधाएं और इनामी राशि मेडल जीतने के बाद मिलती थी, लेकिन अब तैयारी के दौरान ही करोड़ों खर्च किए जा रहे हैं। नकद पुरस्कारों में भी भारी वृद्धि हुई है:
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ओलंपिक पदक विजेता (केंद्र सरकार की राशि):
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गोल्ड मेडल: ₹75 लाख
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सिल्वर मेडल: ₹50 लाख
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ब्रॉन्ज मेडल: ₹30 लाख
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एशियाई/राष्ट्रमंडल खेल (केंद्र सरकार की राशि):
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गोल्ड मेडल: ₹30 लाख
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सिल्वर मेडल: ₹20 लाख
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ब्रॉन्ज मेडल: ₹10 लाख
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(एक दशक पहले ओलंपिक में गोल्ड के लिए यह राशि ₹50 लाख और अन्य पदकों के लिए इससे भी कम हुआ करती थी।)
राज्य सरकारों की ओर से बारिश:
10 साल पहले राज्य सरकारों की नीतियां उतनी स्पष्ट नहीं थीं। आज हरियाणा, उत्तर प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्य ओलंपिक गोल्ड जीतने पर ₹6 करोड़ तक की नकद राशि, करोड़ों की जमीन और क्लास-1 अफसर (जैसे DSP या डिप्टी कलेक्टर) की नौकरी तुरंत दे रहे हैं।
भारी निवेश के बाद भी ओलंपिक में पदक कम क्यों?
अगर बजट दोगुना हो गया है और एशियाई खेलों में मेडल 57 से 107 हो गए हैं, तो ओलंपिक में हम 6 या 7 मेडल पर क्यों रुके हैं?
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स्पोर्ट्स साइंस और ग्लोबल कॉम्पिटिशन: ओलंपिक स्तर पर सिर्फ टैलेंट काम नहीं आता, बल्कि एलीट स्पोर्ट्स साइंस (बायोमैकेनिक्स, स्पोर्ट्स साइकोलॉजी) की जरूरत होती है। भारत ने इसमें निवेश शुरू किया है, लेकिन अमेरिका, चीन और यूरोप हमसे दशकों आगे हैं।
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ग्रासरूट से पोडियम तक का समय: खेल विशेषज्ञों के अनुसार, किसी नए स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर या योजना (जैसे खेलो इंडिया) से एक चैंपियन तैयार होने में 12 से 15 साल का समय लगता है। 2014-16 में बोए गए बीज का असली परिणाम 2028 या 2032 के ओलंपिक में दिखेगा।
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चौथे स्थान का दर्द: पेरिस 2024 ओलंपिक में 6 पदकों के अलावा भारतीय खिलाड़ी 6 मौकों पर चौथे स्थान पर रहे। यह दर्शाता है कि हमारे खिलाड़ी पोडियम के बेहद करीब पहुंच चुके हैं, लेकिन फाइनल हर्डल पार करने के लिए अभी मेंटल कंडीशनिंग और माइक्रो-लेवल ट्रेनिंग में सुधार की दरकार है।
एशियाई स्तर पर भारत ने अपना दबदबा कायम कर लिया है। सरकार की मौजूदा नीतियां सही दिशा में हैं, बस ओलंपिक की मेडल टैली में इसका रिफ्लेक्शन दिखने में अभी एक दशक का समय और लग सकता है।

