‘पापा मेरी क्या गलती थी..’: छह महीने की बच्ची को पिता ने दो बार फर्श पर पटका, आखिर क्यों निशाना बनते हैं मासूम?
Domestic Violence Against Children। परिवार को बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित जगह माना जाता है, लेकिन जब इसी परिवार के सदस्य हिंसा पर उतर आते हैं, तो मासूमों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ में हाल के दिनों में सामने आई बच्चों के साथ मारपीट और क्रूरता की घटनाएं इस चिंता को और गहरा कर रही हैं। कहीं पति-पत्नी के विवाद में छह माह की बच्ची को जमीन पर पटकने का आरोप है, तो कहीं छोटे बच्चों के साथ मारपीट, भूखा रखने और सिगरेट से दागने जैसी क्रूरता के मामले सामने आए हैं।
इन घटनाओं में एक बात समान नजर आती है-पारिवारिक तनाव और आपसी विवाद के बीच उन बच्चों को निशाना बनाया गया, जो न तो अपनी सुरक्षा खुद कर सकते हैं और न ही हिंसा का प्रभावी ढंग से विरोध कर सकते हैं। सवाल यह है कि आखिर घरेलू विवाद बच्चों के खिलाफ हिंसा में कैसे बदल जाते हैं? क्या इसके पीछे गुस्से पर नियंत्रण न रख पाना, मानसिक तनाव या बचपन के अनुभव जिम्मेदार हो सकते हैं?
छह माह की बच्ची को दो बार जमीन पर पटकने का आरोप
रायपुर के कोटा स्थित बीएसयूपी कॉलोनी में घरेलू विवाद के दौरान छह माह की बच्ची के साथ कथित हिंसा का मामला सामने आया है। पुलिस के अनुसार, बच्ची की मां सरगम कावरिया ने शिकायत में बताया कि 14 अक्टूबर की रात मायके जाने की बात को लेकर उसके पति आशीष कावरिया ने विवाद शुरू कर दिया। आरोप है कि रात करीब डेढ़ बजे मारपीट के दौरान उसने बच्ची हिमानी को उठाकर जमीन पर पटक दिया। मां के विरोध करने पर आरोपी ने बच्ची को दोबारा जमीन पर पटक दिया, जिससे वह बेहोश हो गई। परिजन उसे तत्काल एम्स लेकर पहुंचे, जहां बच्ची को आईसीयू में भर्ती कर इलाज किया जा रहा है। सरस्वती नगर पुलिस ने मामला दर्ज कर आरोपी पिता को गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया। यह घटना बताती है कि घरेलू विवाद का असर केवल पति-पत्नी तक सीमित नहीं रहता। जब विवाद के दौरान हिंसा बढ़ती है, तो घर में मौजूद बच्चे भी गंभीर खतरे में पड़ सकते हैं।
छत्तीसगढ़ में पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
बच्चों के साथ हिंसा की घटनाएं केवल एक परिवार तक सीमित नहीं हैं। रायपुर में बीते समय में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जिनमें बच्चों को अपने ही परिजनों की कथित क्रूरता का सामना करना पड़ा।
हीरापुर में ढाई वर्षीय बच्चे की मौत: 18 नवंबर 2025 को कबीर नगर क्षेत्र के हीरापुर सतनामी पारा में ढाई वर्षीय प्रशांत सेन की मौत का मामला सामने आया था। पुलिस जांच में बच्चे के सौतेले पिता पर लगातार मारपीट करने के आरोप सामने आए। इस मामले में बच्चे की मां और उसके साथी को गिरफ्तार किया गया था।
डूमरतराई में पत्नी और दो बेटों की हत्या: सितंबर 2026 में माना थाना क्षेत्र के डूमरतराई साहूपारा में पारिवारिक विवाद के बाद भुनेश्वर साहू पर अपनी पत्नी खिलेश्वरी साहू और दो बेटों आशीष (10) तथा ज्ञान (8) की चाकू से हमला कर हत्या करने का आरोप लगा। शुरुआती जांच में पत्नी के चरित्र पर संदेह को विवाद की वजह बताया गया था।
तीन साल के बच्चे का हाथ फ्रैक्चर: 13 अक्टूबर 2026 को पंडरी के तरुण नगर में तीन वर्षीय रोहित और उसके भाई-बहन के साथ कथित मारपीट का मामला सामने आया। आरोप है कि बच्चों की मां अन्नू देवी और सौतेला पिता राजा दीप उनके साथ मारपीट करते थे और उन्हें खाना भी नहीं देते थे। घटना में रोहित का हाथ फ्रैक्चर होने की बात सामने आई। उसके शरीर पर सिगरेट से दागने के निशान मिलने की भी जानकारी दी गई। छह वर्षीय बहन लक्ष्मी ने मोहल्ले के लोगों को घटना के बारे में बताया, जिसके बाद मामला सामने आया।
इन मामलों की परिस्थितियां अलग-अलग हैं, लेकिन बच्चों की सुरक्षा और परिवार के भीतर होने वाली हिंसा को लेकर ये गंभीर सवाल उठाते हैं।
आखिर गुस्से में बच्चों को ही क्यों बनाया जाता है निशाना?
मनोरोग विशेषज्ञ डॉ. सुरभि दुबे के अनुसार, कुछ लोगों में तनाव सहने और अपने गुस्से को नियंत्रित करने की क्षमता कमजोर होती है। घरेलू विवाद, आर्थिक दबाव, आपसी तनाव या अपनी बात मनवाने की जिद ऐसी स्थितियों में गुस्सा बढ़ा सकती है। कुछ लोगों को लगता है कि मारपीट करके वे बच्चों या परिवार के अन्य सदस्यों को अपने नियंत्रण में रख सकते हैं।
विशेषज्ञ के मुताबिक, जिन लोगों ने बचपन में हिंसा का अनुभव किया होता है, उनमें से कुछ बड़े होकर उसी व्यवहार को दोहराने लगते हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि बचपन के अनुभव झेलने वाला हर व्यक्ति हिंसक बन जाता है। व्यक्ति का व्यवहार कई परिस्थितियों और उसके सीखे हुए तरीकों से प्रभावित होता है।
छोटे बच्चे विशेष रूप से असुरक्षित होते हैं। वे अपनी परेशानी को स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर पाते, न ही किसी वयस्क के हिंसक व्यवहार से खुद को बचाने में सक्षम होते हैं। ऐसे में गुस्से या नियंत्रण की प्रवृत्ति से जुड़ी हिंसा का गंभीर असर उन पर पड़ सकता है।
सबसे जरूरी बात यह है कि तनाव, गुस्सा या पारिवारिक विवाद किसी भी परिस्थिति में बच्चों के साथ हिंसा को जायज नहीं ठहराते। गुस्सा आना एक भावनात्मक प्रतिक्रिया हो सकती है, लेकिन किसी बच्चे को चोट पहुंचाना एक गंभीर व्यवहार है, जिसके लिए जवाबदेही जरूरी है।
बच्चों पर हिंसा के क्या हो सकते हैं दुष्परिणाम?
बच्चों के साथ मारपीट का असर केवल शारीरिक चोट तक सीमित नहीं रहता। गंभीर मामलों में फ्रैक्चर, सिर की चोट और जान का खतरा हो सकता है। इसके अलावा बच्चे लंबे समय तक डर, असुरक्षा और तनाव महसूस कर सकते हैं। उन्हें परिवार के सदस्यों पर भरोसा करने में परेशानी हो सकती है और उनके व्यवहार, पढ़ाई तथा सामाजिक संबंधों पर भी असर पड़ सकता है।
बार-बार हिंसा का सामना करने वाले बच्चों में चुप रहने, अचानक डर जाने, आक्रामक व्यवहार करने या लोगों से दूरी बनाने जैसे बदलाव दिखाई दे सकते हैं। हालांकि, इन संकेतों का होना अपने आप में हिंसा का प्रमाण नहीं है। ऐसे बदलाव दिखने पर बच्चे की स्थिति को संवेदनशीलता से समझना जरूरी है।
बच्चों को हिंसा से बचाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
डॉ. सुरभि दुबे के अनुसार, हिंसक व्यवहार करने वाले व्यक्ति की मनोवैज्ञानिक जांच और गुस्से को नियंत्रित करने के लिए परामर्श मददगार हो सकते हैं। लेकिन केवल परामर्श पर्याप्त नहीं है। सबसे पहले बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करना और उसे हिंसक माहौल से दूर रखना जरूरी है।
यदि किसी बच्चे के साथ मारपीट हो रही है, तो परिवार के अन्य सदस्यों, पड़ोसियों या आसपास के जिम्मेदार लोगों को इसे निजी पारिवारिक मामला समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। बच्चे को तत्काल खतरा होने पर पुलिस या आपातकालीन सहायता लेनी चाहिए। भारत में बच्चों की सहायता के लिए चाइल्ड हेल्पलाइन 1098 और आपातकालीन पुलिस सहायता के लिए 112 पर संपर्क किया जा सकता है।
इसके साथ ही स्कूलों, आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, स्वास्थ्यकर्मियों और बाल संरक्षण से जुड़े तंत्र की भूमिका भी अहम है। बच्चों के शरीर पर बार-बार चोट के निशान, असामान्य डर या हिंसा से जुड़े खुलासे को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। शिकायत मिलने पर बच्चे की सुरक्षा, चिकित्सकीय सहायता और आवश्यक कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना जरूरी है।
घर तभी सुरक्षित, जब बच्चों के लिए हिंसा की कोई जगह न हो
बच्चों के साथ होने वाली हिंसा को केवल गुस्से में हुई गलती या पारिवारिक विवाद का नतीजा मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। इसके पीछे तनाव, नियंत्रण की प्रवृत्ति और सीखे हुए व्यवहार जैसे कारक हो सकते हैं, लेकिन जिम्मेदारी हमेशा हिंसा करने वाले व्यक्ति की होती है।
ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए जरूरी है कि हिंसा के शुरुआती संकेतों को पहचाना जाए, जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद ली जाए और बच्चों की सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा जाए। आखिरकार, किसी भी बच्चे के लिए घर वह जगह होना चाहिए जहां उसे सुरक्षा, देखभाल और अपनापन मिले-डर और हिंसा नहीं।

