15 अक्टूबर से UPI पर 0.4% चार्ज: सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, बाजार में मची खलबली और असर की पूरी ग्राउंड रिपोर्ट

UPI Charges 2026 Impact. हाल ही में केंद्र सरकार और नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) ने यूपीआई पेमेंट्स को लेकर एक बड़ा फैसला लिया है। 15 अक्टूबर 2026 से 2,000 रुपये से अधिक के पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) ट्रांजेक्शन पर 0.4% मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू किया जा रहा है। इस फैसले की घोषणा के बाद से ही पेमेंट इकोसिस्टम, व्यापारियों और बाजार में खासी हलचल (Market Reaction) देखी जा रही है।

इस नए चार्ज को लेकर बाजार में सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं, जो इस प्रकार हैं:

बाजार में उथल-पुथल और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा

व्यापारियों के एक वर्ग ने इस शुल्क का कड़ा विरोध किया है और मामला देश की सबसे बड़ी अदालत तक पहुंच गया है:

  • इस नए शुल्क के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 (Payment and Settlement Systems Act, 2007) की संशोधित धारा 10A की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।

  • याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह संशोधन कार्यपालिका को बिना किसी दिशा-निर्देश के यह तय करने की शक्ति देता है कि किस इलेक्ट्रॉनिक भुगतान मोड को ‘नो-चार्ज’ (बिना शुल्क) सुरक्षा मिलेगी।

  • इस मामले में केंद्र सरकार, रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) और अन्य को प्रतिवादी (respondents) बनाया गया है।

  • हालांकि, हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने 0.4% चार्ज लगाने के सरकार के फैसले पर अंतरिम रोक (interim stay) लगाने से इनकार कर दिया है।

सकारात्मक असर: पेमेंट कंपनियों और बैंकों की बांछें खिलीं

वित्तीय संस्थानों और पेमेंट कंपनियों के लिए यह फैसला एक बहुत बड़ी संजीवनी माना जा रहा है:

  • ब्रोकरेज फर्म्स का अनुमान है कि इस नए चार्ज (MDR) से पेमेंट इंडस्ट्री के लिए सालाना 20,000 करोड़ रुपये तक का नया रेवेन्यू पूल (revenue pool) तैयार होगा।

  • इस MDR का कोई भी हिस्सा सरकार (exchequer) के पास नहीं जाएगा, बल्कि इसे बैंकों, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स (PSPs) और यूपीआई ऐप्स के बीच बांटा जाएगा।

  • भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने इस कदम का सार्वजनिक रूप से समर्थन किया है और इसे भारत के डिजिटल भुगतान इकोसिस्टम की दीर्घकालिक स्थिरता (long-term sustainability) को मजबूत करने वाला एक महत्वपूर्ण कदम बताया है।

नकारात्मक असर और व्यापारियों की चिंताएं

बड़े व्यापारियों के लिए यह नियम लागत बढ़ाने वाला साबित हो रहा है:

  • जिन मर्चेंट्स का लेनदेन बड़ा होता है, उन्हें अब 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान को स्वीकार करने की लागत को अपने बिजनेस खर्च (payment-processing expenses) में जोड़ना होगा।

  • 2,000 रुपये से ऊपर के भुगतानों पर 0.4% के हिसाब से यह चार्ज लगेगा, हालांकि 75,000 रुपये या उससे अधिक के ट्रांजेक्शन पर यह शुल्क अधिकतम 300 रुपये तक सीमित (capped) रहेगा।

आम जनता और छोटे दुकानदारों को राहत

बाजार में भले ही खलबली हो, लेकिन आम ग्राहकों और छोटे दुकानदारों को इस नए नियम से पूरी तरह सुरक्षित रखा गया है:

  • ग्राहकों से यूपीआई पेमेंट करने पर कोई भी शुल्क (MDR) नहीं लिया जाएगा।

  • सभी पर्सन-टू-पर्सन (P2P) ट्रांजेक्शन पूरी तरह से फ्री रहेंगे।

  • वित्त मंत्रालय के अनुसार, लगभग 96% मर्चेंट ट्रांजेक्शन (जो 2000 रुपये या उससे कम के होते हैं) इस नए नियम से अप्रभावित रहेंगे और उन पर कोई MDR नहीं लगेगा।

  • छोटे मर्चेंट्स (P2PM) जो यूपीआई क्यूआर (UPI QR) के जरिए हर महीने 1 लाख रुपये तक प्राप्त करते हैं, उनके लिए यह सेवा शून्य MDR (Zero MDR) के साथ जारी रहेगी।

  • साथ ही, रेलवे, टेलीकॉम, बीमा, ईंधन (fuel) और सार्वजनिक उपयोगिताओं (utilities) जैसे आवश्यक सेक्टर्स में 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान पर 0.4% की जगह मात्र 5 रुपये का फ्लैट रियायती MDR चार्ज लगेगा।

कुल मिलाकर, 15 अक्टूबर 2026 से लागू हो रहे इस नियम ने पेमेंट इंडस्ट्री में उत्साह भरा है, लेकिन बड़े मर्चेंट्स के मुनाफे पर इसका हल्का असर पड़ना तय है। अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं।